Showing posts with label Rajasthan High Court. Show all posts
Showing posts with label Rajasthan High Court. Show all posts

Thursday, 9 July 2026

हाईकोर्ट की सख्ती: राजाखेड़ा में चारागाह व वन भूमि से अतिक्रमण हटाने के निर्देश, अफसरों को दी FIR की छूट

 जयपुर :

राजस्थान हाईकोर्ट ने धौलपुर जिले के राजाखेड़ा की ग्राम पंचायत बाजना में चारागाह व वन भूमि पर हो रखे अतिक्रमणों के खिलाफ सख्ती दिखाई है. इसके साथ ही अदालत ने संबंधित अफसरों को कहा है कि वे चाहे तो अतिक्रमियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करे और उनकी गिरफ्तारी करें, लेकिन अतिक्रमण हटाए जाने चाहिए. वहीं खंडपीठ ने अतिक्रमण हटाकर दो सप्ताह में पालना रिपोर्ट पेश करने को कहा है. एक्टिंग सीजे एसपी शर्मा व जस्टिस मनीष शर्मा की खंडपीठ ने यह आदेश रामनिवास की जनहित याचिका पर दिए.

सुनवाई के दौरान राजाखेड़ा, धौलपुर की उपखंड अधिकारी सुशीला मीणा ने अदालत में उपस्थित होकर माना कि जमीन के बडे हिस्से पर अतिक्रमण किया गया है. इसमें से कुछ अतिक्रमण हटा दिए हैं, लेकिन बाकी अतिक्रमण को भी हटाना है.

https://www.etvbharat.com/amp/hi/state/rajasthan-high-court-orders-file-fir-and-arrest-encroachers-but-ensure-land-is-cleared-rjs26070900512

Sunday, 28 September 2025

हाईकोर्ट- क्षेत्राधिकार वाली चारागाह भूमि का उपयोग कर सकता है जेडीए

  • सेज स्थापित करने के लिए चारागाह जमीन आवंटन को दी थी PIL में चुनौती

हाई कोर्ट की खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि जेडीए एक्ट की धारा 2(8) के तहत जयपुर क्षेत्राधिकार में आने वाली भूमि शहरी भूमि की श्रेणी में आती है, इसलिए धारा 54 के तहत जेडीए ऐसी भूमि को सेज सहित अपनी किसी भी अन्य स्कीम के लिए आवंटित कर सकता है। जस्टिस इन्द्रजीत सिंह और जस्टिस भुवन गोयल की खंडपीठ ने यह आदेश रामकरण व अन्य की ओर से दायर जनहित याचिका को खारिज कर दी।

मामले में अदालत ने कहा कि संबंधित भूमि का सार्वजनिक उपयोग किया जा रहा है और प्रार्थियों ने प्रभावितों को याचिका में पक्षकार नहीं बनाया है। यह भूमि साल 2008 में अधिग्रहित की गई थी, जबकि याचिका 7 साल की देरी से साल 2015 में दायर की गई है।

याचिका में कहा गया कि पूर्व में स्थानीय सरपंच ने जनहित याचिका दायर की थी। दूसरी भूमि उपलब्ध कराए बिना जेडीए ने गोचर भूमि को अवाप्त कर लिया है। हाई कोर्ट ने यह याचिका निस्तारित करते हुए विभाग को प्रार्थी का अभ्यावेदन तय करने के लिए कहा था, लेकिन प्रमुख राजस्व सचिव ने अभ्यावेदन खारिज कर दिया। जिस पर उन्होंने याचिका में कहा कि वे स्थानीय ग्रामीण हैं। जेडीए ने भूमि अधिग्रहित करते समय चारागाह के लिए दूसरी समान भूमि नहीं दी है और धारा 54 के आधार पर अभ्यावेदन खारिज किया है। ऐसे में अधिग्रहण को खारिज किया जाए।

इसके जवाब में जेडीए के अधिवक्ता अमित कुड़ी ने कहा कि जेडीए एक्ट की धारा 2(8) के तहत जयपुर के क्षेत्राधिकार में आने वाली भूमि शहरी भूमि की श्रेणी में आती है, धारा 54 के तहत सार्वजनिक उद्देश्य के लिए इस भूमि का उपयोग करने के लिए जेडीए स्वतंत्र है। भूमि अवाप्त कर रीको को दी गई और बाद में इसे महिंद्रा वर्ल्ड सिटी को आवंटित किया गया। मौजूदा समय में यहां कई शैक्षणिक संस्थान और इंडस्ट्री संचालित हो रहे हैं, इसलिए जनहित याचिका को खारिज किया जाए। खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर और जेडीए से सहमत होते हुए पीआईएल को खारिज कर दिया।

मूल ऑनलाइन लेख - https://www.bhaskar.com/local/rajasthan/jaipur/news/high-court-jda-can-use-pasture-land-under-its-jurisdiction-136033719.html

Monday, 1 September 2025

'विवादित' जल निकायों की पहचान विशेषज्ञ करें, केवल राजस्व रिकॉर्ड प्रविष्टियां सत्यापन के लिए पर्याप्त नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट

राजस्थान हाईकोर्ट ने विवादित जल निकायों की पहचान और संरक्षण के लिए तकनीकी विशेषज्ञ मूल्यांकन की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि केवल राजस्व अभिलेख प्रविष्टियाँ ही पर्याप्त नहीं हैं, क्योंकि ज़मीनी हकीकत का सत्यापन सक्षम विशेषज्ञ प्राधिकारी द्वारा किया जाना आवश्यक है।

जस्टिस अनूप कुमार ढांड एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रहे थे जिसमें याचिकाकर्ता के आवंटित खनन क्षेत्र में जाने के अधिकार को राज्य सरकार ने इस आधार पर खारिज कर दिया था कि संबंधित भूमि चारागाह होने के साथ-साथ एक जल निकाय भी है।

यह देखते हुए कि ये विवादित तथ्य हैं जिनका निर्धारण न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 226 के अधिकार क्षेत्र के तहत नहीं कर सकता, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को इन प्रश्नों का पता लगाने के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया।

अदालत ने कहा,
"विवादित जल निकायों की पहचान और संरक्षण के लिए तकनीकी विशेषज्ञ मूल्यांकन की आवश्यकता है। केवल राजस्व अभिलेख प्रविष्टियाँ पर्याप्त नहीं हैं और ज़मीनी स्थितियों/वास्तविकताओं का सत्यापन सक्षम विशेषज्ञ प्राधिकारी द्वारा किया जाना चाहिए।"

याचिकाकर्ता को एक खनन क्षेत्र आवंटित किया गया था और संबंधित भूमि उस क्षेत्र में जाने का एकमात्र रास्ता थी, जिसे निजी प्रतिवादियों ने अनावश्यक अवरोध उत्पन्न करके बंद कर दिया था।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि वह पिछले 20 वर्षों से खनन क्षेत्र में जाने के लिए इन भूमियों का उपयोग कर रहा था और संबंधित ग्राम पंचायत ने भी इस संबंध में याचिकाकर्ता के पक्ष में अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी किया था।

इसके अलावा, यह भी प्रस्तुत किया गया कि ज़िला मजिस्ट्रेट ने भी खनन क्षेत्र में जाने के लिए भूमि का उपयोग करने की उनके पक्ष में सिफ़ारिश की थी। हालांकि, इन सबके बावजूद, राज्य ने याचिकाकर्ता को यह कहते हुए मंज़ूरी देने से इनकार कर दिया कि ऐसी भूमि चरागाह और जल निकाय हैं जिन्हें आवंटित नहीं किया जा सकता या उपयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

राज्य की ओर से तर्क दिया गया कि संबंधित भूमि चारागाह और "पोखर नारी भूमि" यानी एक जल निकाय है। जब प्रस्ताव ज़िला मजिस्ट्रेट के समक्ष रखा गया था, तो इस तथ्य का कहीं भी उल्लेख नहीं किया गया था कि यह भूमि एक जलग्रहण क्षेत्र है जिसे किसी को आवंटित नहीं किया जा सकता।

वकील ने आगे दलील दी कि विवादित आदेश में भी ज़िला मजिस्ट्रेट को अधीनस्थ राजस्व अधिकारियों द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों पर भरोसा न करने की चेतावनी दी गई थी और कोई भी सिफारिश करने से पहले संबंधित राजस्व रिकॉर्ड देखे जाने थे।

तर्कों को सुनने के बाद, न्यायालय ने इस बात पर प्रकाश डाला कि संबंधित भूमि का जल निकाय होना या न होना विवादास्पद है, जिस पर दोनों पक्षों द्वारा अलग-अलग तर्क दिए जा रहे हैं।

"याचिकाकर्ता के अनुसार, संबंधित भूमि पर कोई 'पोखर' या 'नारी' नहीं है, जबकि प्रतिवादियों के अनुसार, संबंधित भूमि पहाड़ों से घिरी हुई है और मानसून के मौसम में वर्षा के पानी के कारण उक्त भूमि पर मौसमी नदी बहती है।"

इस पृष्ठभूमि में, यह राय दी गई कि, "इन सभी तथ्यों पर राजस्व, वन और पंचायती राज विभागों के उच्च पदस्थ अधिकारियों वाली एक विशेषज्ञ समिति द्वारा निर्णय लिया जा सकता है, जो पुराने राजस्व अभिलेखों और मामले के व्यावहारिक ज़मीनी पहलुओं की जाँच करेगी... और फिर तदनुसार उचित निर्णय लिया जाएगा..."

अतः, न्यायालय ने राज्य को इस उद्देश्य के लिए एक "विशेषज्ञ समिति" गठित करने का निर्देश दिया।

मूल ऑनलाइन लेख-  https://hindi.livelaw.in/rajasthan-high-court/disputed-water-bodies-experts-revenue-record-entries-verification-rajasthan-high-court-302578

Monday, 3 March 2025

हाईकोर्ट के आदेश पर तहसील व पालिका प्रशासन ने हटाया अतिक्रमण

 राजस्थान उच्च न्यायालय जयपुर के आदेश पर शुक्रवार को नगर पालिका व तहसील प्रशासन ने वार्ड एक व भोपतपुरा ग्राम सहित अनेक स्थानों पर नपती व सीमाज्ञान के तहत गैर मुमकिन रास्तों पर पाए गए करीब 20 परिवारों के मकान आदि कच्चा व पक्का निर्माण कार्य तोड़कर करीब 60 वर्ष पुराना रास्ता खुलवाया।

मौका मजिस्ट्रेट तहसीलदार सुमन चौधरी ने बताया कि लाखनी निवासी गणपतराम कुड़ी ने राजस्थान उच्च न्यायालय में चारागाह भूमि व सरकारी रास्ते पर अतिक्रमण हटाने की मांग को लेकर रिट दायर की थी। न्यायालय ने अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए थे। न्यायालय के आदेश पर नगर पालिका, सार्वजनिक निर्माण विभाग, विद्यालय, खेल मैदान, भाेपतपुरा ग्राम आदि क्षेत्र में आने वाले खसरा नंबरों की नपती के तहत अतिक्रमण पाया गया। इस पर रास्ता खाली करवाने के लिए 20 अतिक्रमियों को नोटिस दिए गए थे। नोटिस के बाद भी रास्ता खाली नहीं करने पर जेसीबी चलाकर मकान, चारदीवारी सहित कच्चा व पक्का निर्माण कार्य तोड़कर रास्ता खुलवाया गया। इस अवसर पर तहसीलदार चौधरी सहित उपखंड अधिकारी ब्रह्मलाल जाट, नगर पालिका के अधिशाषी अधिकारी देवीलाल बोचल्या, पटवारी जितेंद्र सिंह राठौड़, सरगोठ हल्का पटवारी सुरेंद्र सिंह बाजिया, सार्वजनिक निर्माण विभाग के सहायक अभियंता ताराचंद सैनी, एआरआई मेवाराम जाट, एएसआई जगदीश प्रसाद, पुलिस थाना जाब्ता सहित अनेक अधिकारी, कर्मचारी व क्षेत्र के लोग उपस्थित थे।

रींगस में 20 व भोपतपुरा में एक अतिक्रमण हटाया

नगर पालिका अधिशासी अधिकारी देवीलाल बोचल्या ने बताया कि गैर मुमकिन रास्ते पर नाथूराम जाट, छीतरमल, गुलाब सिंह राठौड़, गिरधारी सिंह राठौड़, भागीरथ कुमावत, सुरजाराम, नजरुद्दीन मोहम्मद, मजीद कुरेशी, अमराराम जाट, बिहारी लाल, जैसाराम निठारवाल, गोपाल सिंह, घासीराम वर्मा, दीपाराम वर्मा, जयप्रकाश श्रीवास्तव, भंवरलाल कुमावत, कर्मवीर सिंह, एडवोकेट भागीरथ सिंह कुड़ी, मालीराम जाट, गणपत राम सहित 20 जनों का अतिक्रमण था।भोपतपुरा ग्राम में जितेंद्र सिंह ने तीन दुकान व करीब 250 वर्गगज में मकान बना रखा था। उसे तोड़ा गया।

साहब हमने तो कर्ज लेकर जमीन खरीदी थी : मकानों पर जेसीबी चलते ही कुछ लोग रोने लग। परिवार के मुखियाओं ने बताया कि साहब हमने तो वर्षों पूर्व रुपए देकर जमीन खरीदकर मकान बनाए थे। अभी तो खरीदी गई जमीन व मकानों बनाने के लिए लिया गया कर्ज भी नहीं चूक पाया है। एक ओर तो हमारा कर्ज नहीं चूक पाया, दूसरी ओर हम अब कहां पर निवास करेंगे। जिसने जमीन बेची है उससे हमें ब्याज सहित रुपए दिलवाएं तो हम कर्ज चुकाएं और कर्ज लेकर फिर से मकान बनाएं, लेकिन अधिकारियों ने नहीं सुनी।

रींगस. नगर पालिका क्षेत्र के वार्ड एक में जेसीबी चलाकर गैर मुमकिन रास्ते से अतिक्रमण हटाता प्रशासन।

मूल ऑनलाइन लेख: - https://www.bhaskar.com/latest-ringus-news-063046-2313709.html

Friday, 27 December 2024

अतिक्रमण हटाने की रिपोर्ट पेश करें, अन्यथा कलक्टर हाजिर हो: हाई कोर्ट ने कहा-आश्चर्य है कि ग्राम पंचायत अतिक्रमियों को संरक्षण दे रही है


हाई कोर्ट ने दौसा जिले की लोटवाड़ा ग्राम पंचायत में चारागाह की जमीन पर अतिक्रमण के मामले में जिला कलक्टर से शपथ पत्र पेश करके अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई का ब्यौरा देने के लिए कहा है। वहीं रिपोर्ट पेश नहीं होने पर 10 जनवरी को अदालत में पेश होने के निर्देश दिए है।

मुख्य न्यायाधीश एमएम श्रीवास्तव और जस्टिस उमाशंकर व्यास की खंडपीठ ने यह आदेश कैलाश चंद की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए।

ग्राम पंचायत अतिक्रमियों को संरक्षण दे रही

याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करने वाले अधिवक्ता प्रेमचद बैरवा ने बताया कि दौसा जिले की ग्राम पंचायत लोटवाड़ा में चारागाह भूमि पर बनी अवैध दुकानों को अतिक्रमण मानते हुए प्रशासन ने 2021 में उन्हें हटाने के आदेश दिए थे। लेकिन अधिकारियों ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया।

अदालत ने इस बात पर भी आश्चर्य जताया कि ग्राम पंचायत की ओर से अतिक्रमियों का संरक्षण किया जा रहा है, जबकि यह पंचायत का काम नहीं है।

तीन साल से नहीं हटा अतिक्रमण

उन्होने बताया कि अदालत ने अतिक्रमण हटाने के संबंध में पिछली सुनवाई पर तहसीलदार बैजूपाड़ा से रिपोर्ट मांगी थी। लेकिन तहसीलदार व एसडीएम ने अभी तक अतिक्रमण हटाने की कोई भी कार्रवाई नहीं की है। अधिकारियों की ओर से अतिक्रमियों को नोटिस जारी कर पुलिस जाप्ता नहीं मिलने का बहाना बनाकर कार्रवाई नहीं की जा रही है।

चारागाह भूमि पर कई बाहुबलियों द्वारा अवैध अतिक्रमण कर दुकानें निर्मित कर व्यवसाय किया जा रहा है। इन लोगों ने करीब 5 बीघा से अधिक भूमि पर अनाधिकृत कब्जा कर लिया है।

उन्होने कहा कि राजस्थान काश्तकारी अधिनियम के प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों के अनुसार चारागाह की भूमि पर किसी भी प्रकार का अतिक्रमण नहीं किया जा सकता है और ना ही चारागाह की भूमि को चारागाह के अलावा किसी अन्य प्रयोजन के लिए काम में लिया जा सकता है।

मूल ऑनलाइन लेख - https://www.bhaskar.com/local/rajasthan/jaipur/news/submit-a-report-on-encroachment-removal-otherwise-the-collector-should-appear-134193698.html


Monday, 9 December 2024

जेडीए की फार्म हाउस योजना को चुनौती देने वाली पीआईएल खारिज, लगाया हर्जाना

जयपुर। राजस्थान हाइकोर्ट ने जेडीए की ओर से जयपुर के रोजडा गांव में विकसित की जा रही फार्म हाउस योजना को चारागाह भूमि पर विकसित करना बताकर हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। इसके साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता स्थानीय सरपंच रामजीलाल यादव व अन्य पर पांच हजार रुपए का हर्जाना भी लगाया है। अदालत ने माना की जनहित याचिका तथ्य छिपाकर और सद्भावी भावना से दायर नहीं की गई है।

सीजे एमएम श्रीवास्तव व जस्टिस उमाशंकर व्यास ने यह आदेश रामजीलाल यादव व अन्य की जनहित याचिका पर दिए। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं में गांव का सरपंच भी है और यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि उसे गांव में होने वाले किसी अतिक्रमण की जानकारी नहीं है। वह अतिक्रमण के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं चाहता था, लेकिन जैसे ही जेडीए की ओर से कार्रवाई शुरू करते हुए उसने जनहित याचिका दायर कर दी।

याचिका में कहा गया था कि गांव की करीब 8 हेक्टेयर जमीन पर जेडीए फार्म हाउस स्कीम लेकर आया था। इस जमीन में चारागाह भूमि भी शामिल है। जबकि चारागाह जमीन पर फार्म हाउस स्कीम विकसित नहीं हो सकती। इसके जवाब में जेडीए की ओर से अधिवक्ता अमित कुडी ने कहा कि जनहित याचिका सद्भावी नहीं है और इसमें निजी हित छिपे हुए हैं।

इससे पहले स्थानीय निवासियों ने इस जमीन पर अतिक्रमण हटाकर यहां पर खेल का मैदान व योगा सेंटर बनाए जाने का प्रतिवेदन दिया था, लेकिन जेडीए ने कार्रवाई शुरू की तो उसका विरोध हुआ। यह पीआईएल जेडीए कार्रवाई को रोकने के लिए हुई है। इसलिए इसे खारिज किया जाए। जिस पर सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने जनहित याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ताओं पर हर्जाना लगाया है।

मूल ऑनलाइन लेख - https://www.mahanagartimes.com/post/pil-challenging-jda-farm-house-scheme-dismissed

Monday, 22 July 2024

हाईकोर्ट ने दिए अतिक्रमण हटाने के आदेश: चारागाह और बीसलपुर विस्थापितों के लिए आरक्षित जमीन पर है प्रभावशाली लोगों का कब्जा


टोडारायसिंह उपखंड के मुंडिया कला पंचायत के ग्राम निमेड़ा के चारागाह व बीसलपुर विस्थापित के लिए आरक्षित जमीन से अतिक्रमण हटाने के आदेश हाईकोर्ट ने टोडारायसिंह तहसीलदार को दिए हैं। यह आदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एमएम श्रीवास्तव व जस्टिस आशुतोष कुमार मिश्रा की खंडपीठ ने अतिक्रमियों के खिलाफ राजस्थान लेण्ड रेवेन्यू एक्ट की धारा 91 के तहत कार्रवाई के दिए हैं। इसके लिए पूर्व सरपंच सीताराम बैरवा व अन्य द्वारा एडवोकेट लक्ष्मीकांत शर्मा मालपुरा के जरिये गत दिनों याचिका दायर की गई थी।

चारागाह भूमि पर प्रभावशाली लोगों का कब्जा

याचिका में बताया गया था कि गांव की चारागाह भूमि पर वहीं के प्रभावशाली लोगों ने अतिक्रमण कर रखे है। स्थानीय लोगों ने कई बार अधिकारियों को अतिक्रमण हटाने की मांग की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। इसलिए ग्रामीणों ने जनहित याचिका दायर की थी। खंडपीठ ने टोडारायसिंह के तहसीलदार को निर्देश दिए है कि राजस्थान लेण्ड रेवेन्यू एक्ट की धारा 1956 की धारा 91 के तहत अतिक्रमियों के खिलाफ चारागाह व बीसलपुर विस्थापित के लिए आरक्षित जमीन से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की जाए।

मूल ऑनलाइन लेख - https://www.bhaskar.com/local/rajasthan/tonk/news/the-high-court-division-bench-ordered-the-removal-of-encroachment-133372284.html

Friday, 5 July 2024

हाईकोर्ट ने मालपुरा तहसीलदार को दिए अतिक्रमण हटाने के निर्देश: ग्राम तितरिया के चारागाह और बीसलपुर आरक्षित भूमि पर अतिक्रमण का मामला


राजस्थान उच्च न्यायालय ने मालपुरा तहसीलदार को अतिक्रमियों के खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। हाईकोर्ट ने यह निर्देश मालपुरा उपखंड की सिंधोलिया ग्राम पंचायत के ग्राम तितरिया के चारागाह व बीसलपुर विस्थापित के आरक्षित भूमि से अतिक्रमण हटाने से जुड़े मामले में दिया। हाईकोर्ट ने लेण्ड रेवेन्यू एक्ट के तहत अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए हैं।

वरिष्ठ न्यायाधीश पंकज भंडारी व न्यायाधीश प्रवीर भटनागर की खंडपीठ ने यह आदेश मालपुरा उपखंड के तितरिया के ग्रामीण कन्हैयालाल गुर्जर द्वारा एडवोकेट लक्ष्मीकांत शर्मा मालपुरा के जरिये दायर की गई जनहित याचिका का निस्तारण करते हुए दिए।

प्रभावशाली लोगों ने किए अतिक्रमण

जनहित याचिका में बताया गया था कि प्रभावशाली लोगों ने ग्राम की चारागाह व बीसलपुर विस्थापित के लिए आरक्षित भूमि पर अवैध रूप से कब्जे कर रखे हैं, साथ ही फार्म पौंड भी बना रखे हैं। स्थानीय प्रशासन को ग्रामीण कई बार शिकायत देकर चारागाह भूमि को अतिक्रमण मुक्त करवाने की गुहार कर चुके हैं लेकिन स्थानीय अधिकारियों द्वारा कोई कार्रवाई नहीं करने पर यह जनहित याचिका दायर की गई।

खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के बाद याचिकाकर्ता को मालपुरा तहसीलदार को इस बारे में विस्तृत प्रतिवेदन देने के निर्देश देते हुए मालपुरा तहसीलदार को लेण्ड रेवेन्यू एक्ट के तहत अतिक्रमियों के विरुद्ध कारवाई के निर्देश देते हुए अतिक्रमण हटाने को कहा है।

मूल ऑनलाइन लेख - https://www.bhaskar.com/local/rajasthan/tonk/news/high-court-directed-malpura-tehsildar-to-remove-encroachment-133285231.html

Sunday, 7 January 2024

Rajasthan High Court: PLI दायर करने वालों को सुरक्षा हो मुहैया,राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा- सुरक्षा सुनिश्चित करें

Rajasthan High Court: राजस्थान हाईकोर्ट ने सीकर की खंडेला तहसील के भोजपुर गांव के मामले में पीआईएल दायर करने वालों को सुरक्षा मुहैया कराने के लिए सीकर एसपी से कहा है. जानें आखिर क्या है पूरा मामला.

Rajasthan High Court: राजस्थान हाईकोर्ट ने सीकर की खंडेला तहसील के भोजपुर गांव में चारागाह भूमि पर अतिक्रमण के खिलाफ जनहित याचिका दायर करने वाले प्रार्थी सहित अन्य परिवार जनों को सुरक्षा देने को कहा है. अदालत ने सीकर एसपी को कहा है कि वह इनके जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा सुनिश्चित करें.

इसके साथ ही अदालत ने मामले में राज्य सरकार,एसपी सीकर,एसडीओ खंडेला व एसएचओ खंडेला सहित अन्य से 31 जनवरी तक जवाब देने के लिए कहा है.जस्टिस समीर जैन ने यह आदेश मनोहर कुमावत व अन्य की याचिका पर दिए.

तीन माह में अतिक्रमण हटाने के आदेश दिए थे

याचिका में कहा गया कि याचिकाकर्ता मनोहर कुमावत ने गांव की चारागाह जमीन पर अतिक्रमण होने पर अतिक्रमियों के खिलाफ हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी. जनहित याचिका पर गत 16 अगस्त को सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने मामले को जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में गठित पीएलपीसी कमेटी को भेजते हुए तीन माह में अतिक्रमण हटाने के आदेश दिए थे.

पक्षकारों की ओर से धमकियां देना शुरू हो गया  

याचिका में कहा गया कि अदालत के आदेश के बाद से ही याचिकाकर्ता व उसके पिता सहित अन्य परिवारजनों को निजी पक्षकारों की ओर से धमकियां देना शुरू हो गया.

कार्रवाई करने का आग्रह किया

उन्होंने इस संबंध में एसपी सहित अन्य स्थानीय अफसरों को प्रतिवेदन देकर कार्रवाई करने का आग्रह किया, लेकिन इसके बावजूद भी उन्हें लगातार धमकियां दी जा रही हैं और इससे उनके जीवन व स्वतंत्रता को भी खतरा है. जिस पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने सीकर एसपी को सुरक्षा मुहैया कराने को कहा है.

मूल ऑनलाइन लेख - https://zeenews.india.com/hindi/india/rajasthan/sikar/rajasthan-high-court-those-who-file-pil-should-be-provided-security/2047994


Saturday, 6 January 2024

पीआईएल दायर करने वालों को सुरक्षा मुहैया कराए सीकर एसपी

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने सीकर की खंडेला तहसील के भोजपुर गांव में चारागाह भूमि पर अतिक्रमण के खिलाफ जनहित याचिका दायर करने वाले प्रार्थी सहित अन्य परिवार जनों को सुरक्षा देने को कहा है। अदालत ने सीकर एसपी को कहा है कि वह इनके जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा सुनिश्चित करे। इसके साथ ही अदालत ने मामले में राज्य सरकार, एसपी सीकर, एसडीओ खंडेला व एसएचओ खंडेला सहित अन्य से 31 जनवरी तक जवाब देने के लिए कहा है। जस्टिस समीर जैन ने यह आदेश मनोहर कुमावत व अन्य की याचिका पर दिए। याचिका में कहा गया कि याचिकाकर्ता मनोहर कुमावत ने गांव की चारागाह जमीन पर अतिक्रमण होने पर अतिक्रमियों के खिलाफ हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। जनहित याचिका पर गत 16 अगस्त को सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने मामले को जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में गठित पीएलपीसी कमेटी को भेजते हुए तीन माह में अतिक्रमण हटाने के आदेश दिए थे। याचिका में कहा गया कि अदालत के आदेश के बाद से ही याचिकाकर्ता व उसके पिता सहित अन्य परिवारजनों को निजी पक्षकारों की ओर से धमकियां देना शुरू हो गया। उन्होंने इस संबंध में एसपी सहित अन्य स्थानीय अफसरों को प्रतिवेदन देकर कार्रवाई करने का आग्रह किया, लेकिन इसके बावजूद भी उन्हें लगातार धमकियां दी जा रही हैं और इससे उनके जीवन व स्वतंत्रता को भी खतरा है। जिस पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने सीकर एसपी को सुरक्षा मुहैया कराने को कहा है।

मूल ऑनलाइन लेख - https://www.tarunmitra.in/article/12374/sikar-sp-should-provide-security-to-those-filing-pil

पीआईएल दायर करने वालों को सुरक्षा मुहैया कराए सीकर एसपी

 06 Jan 2024 20:33:57

जयपुर, 6 जनवरी (हि.स.)। राजस्थान हाईकोर्ट ने सीकर की खंडेला तहसील के भोजपुर गांव में चारागाह भूमि पर अतिक्रमण के खिलाफ जनहित याचिका दायर करने वाले प्रार्थी सहित अन्य परिवार जनों को सुरक्षा देने को कहा है। अदालत ने सीकर एसपी को कहा है कि वह इनके जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा सुनिश्चित करे। इसके साथ ही अदालत ने मामले में राज्य सरकार, एसपी सीकर, एसडीओ खंडेला व एसएचओ खंडेला सहित अन्य से 31 जनवरी तक जवाब देने के लिए कहा है। जस्टिस समीर जैन ने यह आदेश मनोहर कुमावत व अन्य की याचिका पर दिए।

याचिका में कहा गया कि याचिकाकर्ता मनोहर कुमावत ने गांव की चारागाह जमीन पर अतिक्रमण होने पर अतिक्रमियों के खिलाफ हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। जनहित याचिका पर गत 16 अगस्त को सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने मामले को जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में जिठित पीएलपीसी कमेटी को भेजते हुए तीन माह में अतिक्रमण हटाने के आदेश दिए थे। याचिका में कहा गया कि अदालत के आदेश के बाद से ही याचिकाकर्ता व उसके पिता सहित अन्य परिवारजनों को निजी पक्षकारों की ओर से धमकियां देना शुरू हो गया। उन्होंने इस संबंध में एसपी सहित अन्य स्थानीय अफसरों को प्रतिवेदन देकर कार्रवाई करने का आग्रह किया, लेकिन इसके बावजूद भी उन्हें लगातार धमकियां दी जा रही हैं और इससे उनके जीवन व स्वतंत्रता को भी खतरा है। जिस पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने सीकर एसपी को सुरक्षा मुहैया कराने को कहा है।

हिन्दुस्थान समाचार/पारीक/संदीप

मूल ऑनलाइन लेख - https://www.hindusthansamachar.in/Encyc/2024/1/6/Sikar-SP-should-provide-security-to-those-filing-PIL.php

पीआईएल दायर करने वालों को सुरक्षा मुहैया कराए सीकर एसपी

 Jan 6, 2024, 8:32 PM

राजस्थान हाईकोर्ट ने सीकर की खंडेला तहसील के भोजपुर गांव में चारागाह भूमि पर अतिक्रमण के खिलाफ जनहित याचिका दायर करने वाले प्रार्थी सहित अन्य परिवार जनों को सुरक्षा देने को निर्देश दिया है.

सुरक्षा मुहैया कराए सीकर एसपी

जयपुर. राजस्थान हाईकोर्ट ने सीकर की खंडेला तहसील के भोजपुर गांव में चारागाह भूमि पर अतिक्रमण के खिलाफ जनहित याचिका दायर करने वाले प्रार्थी सहित अन्य परिवार जनों को सुरक्षा देने को निर्देश दिया है. अदालत ने सीकर एसपी को कहा है कि वह इनके जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा सुनिश्चित करें. इसके साथ ही अदालत ने मामले में राज्य सरकार, एसपी सीकर, एसडीओ खंडेला व एसएचओ खंडेला सहित अन्य से 31 जनवरी तक जवाब देने के लिए कहा है. जस्टिस समीर जैन ने यह आदेश मनोहर कुमावत व अन्य की याचिका पर दिए.

याचिका में कहा गया कि याचिकाकर्ता मनोहर कुमावत ने गांव की चारागाह जमीन पर अतिक्रमण होने पर अतिक्रमियों के खिलाफ हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी. जनहित याचिका पर गत 16 अगस्त को सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने मामले को जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में गठित पीएलपीसी कमेटी को भेजते हुए तीन माह में अतिक्रमण हटाने के आदेश दिए थे. याचिका में कहा गया कि अदालत के आदेश के बाद से ही याचिकाकर्ता व उसके पिता सहित अन्य परिवारजनों को निजी पक्षकारों की ओर से धमकियां देना शुरू हो गया. उन्होंने इस संबंध में एसपी सहित अन्य स्थानीय अफसरों को प्रतिवेदन देकर कार्रवाई करने का आग्रह किया, लेकिन इसके बावजूद भी उन्हें लगातार धमकियां दी जा रही हैं. उन्होंने कहा कि इससे उनके जीवन व स्वतंत्रता को भी खतरा है, जिस पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने सीकर एसपी को सुरक्षा मुहैया कराने को कहा है.

मूल ऑनलाइन लेख  - https://www.etvbharat.com/hindi/rajasthan/state/jaipur/sikar-sp-should-provide-security-to-those-filing-pil/rj20240106203207641641602

Saturday, 29 April 2023

चारागाह भूमि ग्राम पंचायतों में स्वतः निहित नहीं

राजस्थान हाईकोर्ट ने पाली जिले के रोहट तहसील के नौ गांवों में स्थित गोचर भूमि को जोधपुर-पाली-मारवाड़ औद्योगिक क्षेत्र घोषित करने को चुनौती देने वाली जनहित याचिका को खारिज करते हुए महत्वपूर्ण विधिक बिंदुओं को निर्णित किया है।

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने  पाली जिले के रोहट तहसील के नौ गांवों में स्थित गोचर भूमि को जोधपुर-पाली-मारवाड़ औद्योगिक क्षेत्र घोषित करने को चुनौती देने वाली जनहित याचिका को खारिज करते हुए महत्वपूर्ण विधिक बिंदुओं को निर्णित किया है।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एमएम श्रीवास्तव तथा न्यायाधीश रेखा बोराणा की खंडपीठ में याचिकाकर्ता पापापुरी सहित अन्य की ओर से  पाली जिले के नौ गांवों में चारागाह, ओरण तथा आगोर के रूप में वर्गीकृत भूमि को अन्य उपयोग के लिए विभाजित करने का मामला उठाया गया था। नौ गांवों की सार्वजनिक भूमि को पाली जिला कलक्टर ने जोधपुर-पाली-मारवाड़ औद्योगिक क्षेत्र घोषित किया था। याचिका के अनुसार उद्योग विभाग के प्रमुख शासन सचिव ने 12 अक्टूबर, 2020 को  पाली जिले की रोहट तहसील के नौ गांव  डूंगरपुर, सिणगारी, ढूंढली, दूदली, निम्बली पटेलान, निम्बली ब्राह्मनान, दानासनी, रोहट तथा दलपतगढ़ को सम्मिलित कर विशेष निवेश रीजन घोषित किया था, जिसे  जोधपुर पाली मारवाड़ औद्योगिक क्षेत्र नामित किया गया। इस रीजन के लिए रीको को क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण के रूप में पदाभिहित करते हुए जोधपुर-पाली-मारवाड़ इंडस्ट्रियल डवलपमेंट कॉरपोरेशन का गठन किया गया। याचिका में जिला कलक्टर,  पाली के 16 दिसंबर 2020 के एक आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें नौ गांवों में स्थित समस्त राजकीय भूमि का नामांतरकरण डवलपमेंट कॉरपोरेशन के पक्ष में करने के आदेश जारी किए गए थे। इन गांवों में स्थित गोचर भूमि भी डवलपमेंट कॉरपोरेशन के पक्ष में दर्ज कर दी गई। इसे मुख्य रूप से इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि गोचर भूमि ग्राम पंचायतों में निहित हो चुकी थी।

कोर्ट ने ये कहा-चरागाह भूमि चाहे पंचायतों के नियंत्रण या प्रबंधन में रही हो, महज इस आधार पर यह नहीं कहा जा सकता है कि चरागाह भूमि सामान्य भूमि के रूप में 1953 के निरस्त अधिनियम की धारा 88 के तहत स्वतः पंचायतों में निहित हो गई है।

चरागाह भूमि न तो 1956 के अधिनियम के प्रावधानों के तहत स्वतः पंचायतों में निहित थी और न ही 1955 का अधिनियम या 1953 का निरस्त अधिनियम या संबंधित अधिनियम के तहत बनाए गए किसी भी नियम के तहत स्वतः पंचायतों में निहित है।

-राजस्थान विशेष निवेश क्षेत्र अधिनियम, 2016 के लागू होने की तारीख तक, तहसील रोहट, के नौ राजस्व गांवों-ग्राम पंचायतों के स्थानीय क्षेत्र में स्थित चरागाह भूमि कभी भी संबंधित ग्राम पंचायत में निहित नहीं थी। इसलिए इसे अधिनियम की धारा 27 के तहत निहित खंड के दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि चूंकि सभी चरागाह भूमि पहले से ही ग्राम पंचायतों में निहित थी और इसलिए, उन्हें विशेष निवेश क्षेत्र से बाहर रखा जाए, खारिज किया जाता है।

मूल ऑनलाइन लेख - https://www.patrika.com/jodhpur-news/pasture-land-not-automatically-vested-in-gram-panchayats-8206501

Monday, 9 January 2023

अतिक्रमण हटवाने के आदेश: कोर्ट ने दिए चरागाह, जोहड़ व रास्तों के अतिक्रमण 3 माह में हटवाने के आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने सोमवार को पीपलू उपखंड के झिराना ग्राम पंचायत की चारागाह भूमि, जोहड़ व रास्तों के अतिक्रमण 3 माह में हटवाने के आदेश टोंक कलेक्टर को दिए हैं। मुख्य न्यायाधीश पंकज मिथल व न्यायाधीश शुभा मेहता की खंडपीठ ने यह आदेश झिराना निवासी श्योराज जाट व अन्य की ओर से एडवोकेट लक्ष्मीकांत शर्मा मालपुरा के जरिये दायर की गई जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए हैं। याचिका में बताया कि झिराना गांव की चारागाह भूमि पर प्रभावशाली लोगों ने अतिक्रमण कर रखे हैं। सरपंच व ग्रामीणों ने कई बार स्थानीय अधिकारियों को अवगत करवाया, किंतु कोई कार्यवाही नहीं हुई। ग्रामीणों ने चारागाह पर सरसों की खेती कर रखी है। इससे गांव के पशुधन को चराने में दिक्कत हो रही है। साथ ही आम रास्तों सहित जोहड़ व तालाब पर भी कब्जे हो रखे हैं।

मूल ऑनलाइन लेख - https://www.bhaskar.com/local/rajasthan/tonk/news/the-court-ordered-the-removal-of-encroachments-on-pastures-johads-and-roads-in-3-months-130780313.html

Monday, 21 November 2022

चारागाह भूमि से तीन माह में अतिक्रमण हटाए कलेक्टर

जयपुर, 21 नवंबर (हि.स.)। राजस्थान हाईकोर्ट ने झुंझुनूं की सूरजगढ तहसील के ग्राम फरहत की चारागाह भूमि पर हुए अतिक्रमण पर कार्रवाई करने के लिए जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में गठित पीएलपीसी को तीन माह का समय दिया है। वहीं अदालत ने याचिकाकर्ता को कहा है कि वह इस संबंध में अपनी आपत्ति पीएलपीसी के समक्ष पेश करे। जस्टिस इन्द्रजीत सिंह की एकलपीठ ने यह आदेश भगवानी देवी की याचिका पर दिए।

याचिका में अधिवक्ता बाबूलाल बैरवा ने अदालत को बताया कि फरहत गांव की सात हैक्टर चारागाह भूमि पर गांव के प्रभावशाली लोगों ने कब्जा करने के बाद निर्माण कर लिया है। यदि अन्य लोग इस भूमि पर गलती से भी प्रवेश कर जाए तो अतिक्रमी उन्हें मारने पर उतारू हो जाते हैं। याचिका में कहा गया कि अतिक्रमण को हटाने ने लिए स्थानीय प्रशासन को कई बार शिकायत दी गई, लेकिन अतिक्रमी रसूखदार होने के चलते उन पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। जिस पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने जिला कलेक्टर को अतिक्रमण पर कार्रवाई करने को कहा है।


हिन्दुस्थान समाचार/पारीक/संदीप 

https://www.hindusthansamachar.in/Encyc/2022/11/21/Collector-removed-encroachment-from-pasture-land.php

Tuesday, 4 October 2022

राजस्थान उच्च न्यायालय : गोचर भूमि से अतिक्रमण हटाने के आदेश की पालना में कार्रवाई करने के आदेश

जोधपुर, 03 अक्टूबर (हि.स.)। 

राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधीश संदीप मेहता एवं कुलदीप माथुर की खण्डपीठ द्वारा जनहित याचिका लादूसिंह व अन्य बनाम राजस्थान राज्य में सुनवाई करते हुए अप्रार्थीगण के द्वारा गोचर भूमि पर किये गये अतिक्रमण को हटाने के आदेश की पालनार्थ कार्यवाही करने के आदेश पारित किये है।

सबाङिया,बिलाड़ा जोधपुर पूर्व में ग्राम संबाडिय़ा तहसील बिलाड़ा, जिला जोधपुर के निवासी लादूसिंह, भंवरसिंह, छोटूसिंह, चैनाराम एवं जोगाराम के अधिवक्ता प्रवीण दयाल दवे एवं रुचि परिहार द्वारा न्यायालय के समक्ष जनहित याचिका प्रस्तुत कर न्यायालय को बताया था कि ग्राम संबाडिय़ा के खसरा नंबर 6,14, 18, 98, 99, 206, 232, 239, 281/3, 289, 292/1 कुल खसरा 11 रकबा 1781.17 बीघा (एक हजार सात सौ इक्यासी बीघा 17 बिस्वा) गौचर भूमि स्थित है, जहां पर गोचर भूमि पर अतिक्रमण कर, मौके पर निर्माण कार्य कर, खेती कर, ट्यूबवेल खोदे जा रहे है, विद्य़ुत कनेक्शन लिये जा रहे है, संपूर्ण चारागाह भूमि पर अतिक्रमण किया जा चुका है, जिसमें वर्तमान सरपंच भी सम्मिलित है।

याचिका में यह भी बताया कि गोचर भूमि पर अतिक्रमण मुक्त करने के संदर्भ में मुख्यमंत्री राजस्थान, उपखण्ड अधिकारी बिलाड़ा, विकास अधिकारी बिलाड़ा, तहसीलदार बिलाड़ा, जिला कलेक्टर जोधपुर को ज्ञापन देने के बावजूद कार्यवाही नही की जा रही है, जिस पर पूर्व में 1 दिसम्बर 2018 को न्यायाधिपति संगीत लोढ़ा एवं दिनेश मेहता द्वारा सुनवाई करते हुए राज्य सरकार व अन्य को नोटिस जारी कर याचिका के लंबित रहते गोचर भूमि पर किसी भी प्रकार के अन्य कार्य पर रोक लगाते हुए गोचर भूमि पर यथास्थिति का स्थगन आदेश जारी किया था। अधिवक्ता दवे ने बताया कि जनहित याचिका की पुन: सुनवाई करते हुए न्यायालय द्वारा 1 दिसम्बर 2018 के आदेश को स्पष्ट करते हुए कहा कि न्यायालय द्वारा रेवेन्यू रिकॉर्ड जो कि गोचर भूमि है, को अन्य उपयोग में न लेने के संदर्भ में पारित किया था, जो आज भी प्रभावी है, पूर्व में न्यायालय द्वारा भूमि की प्रकृति को बनाये रखने के लिये आदेश पारित किया था, न कि भूमि पर अवैध कब्जे बनाये रखने के संदर्भ में किया था।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि बिना अधिकार के प्रवेश करने वालों का अनाधिकृत कब्जा गोचर भूमि पर है, तो अप्रार्थीगण अवैध कब्जे को हटाने के संदर्भ में उचित कार्यवाही कर सकते है। इस प्रकार राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा 1 दिसम्बर 2018 को पारित आदेश को स्पष्ट करते हुए 17 जुलाई 2019 को पुन: आदेश कर ग्राम संबाडिय़ा तहसील बिलाड़ा, जिला जोधपुर की कुल 1781.17 बीघा (एक हजार सात सौ इक्यासी बीघा 17 बिस्वा) भूमि पर किये गये अवैध अतिक्रमण को हटाने के संदर्भ में उचित कार्यवाही करने के आदेश दिए थे।


हिन्दुस्थान समाचार/सतीश/संदीप

https://www.hindusthansamachar.in/Encyc/2022/10/3/rajasthan-high-court-order-for-gochar-land.php

Sunday, 25 September 2022

अवमानना नोटिस:आदेश की पालना नहीं की, टोंक कलेक्टर को अवमानना नोटिस दिया

 टोंक

अदालती आदेश के बाद भी चारागाह जमीन से अतिक्रमण नहीं हटाने पर टोंक जिला कलेक्टर चिन्मय गोपाल को अवमानना नोटिस जारी कर जवाब देने के लिए कहा है। अदालत ने उनसे पूछा है कि उन्होंने आदेश का पालन क्यों नहीं किया। जस्टिस पंकज भंडारी व समीर जैन की खंडपीठ ने यह निर्देश मालपुरा उपखण्ड के धौला का खेड़ा निवासी छीतर लाल शर्मा की अवमानना याचिका पर दिया।

अधिवक्ता लक्ष्मीकांत शर्मा ने बताया कि हाईकोर्ट की खण्डपीठ ने 3 जनवरी 2022 को टोंक जिला कलेक्टर व पीएलपीसी चेयरमैन को चारागाह जमीन से अतिक्रमण हटाने के लिए ग्रामीणों के प्रतिवेदन पर दो महीने में कार्रवाई का निर्देश दिया था। आदेश की पालना में ग्रामीणों ने कलेक्टर को प्रतिवेदन दे दिया, लेकिन रेवेन्यू अफसरों ने चारागाह जमीन से अतिक्रमण हटाने के लिए मामूली कार्रवाई की है। जबकि चारागाह जमीन पर कुछ ग्रामीणों व प्रभावशाली लोग अभी भी अवैध खनन कर रहे हैं और उन्होंनें वहां पर कच्चा व पक्का निर्माण कार्य भी कर लिया है। इसलिए आदेश का पालन करवाया जाए।

https://www.bhaskar.com/local/rajasthan/tonk/news/did-not-comply-with-the-order-gave-contempt-notice-to-tonk-collector-130358015.html

Friday, 23 September 2022

कलेक्टर के आदेश के बाद भी नहीं हट रहा अतिक्रमण, अब देना होगा जवाब


राजस्थान हाईकोर्ट ने अदालती आदेश के बावजूद भी चारागाह भूमि से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई नहीं करने पर टोंक कलेक्टर चिन्मयी गोपाल को अवमानना के कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। 


राजस्थान हाईकोर्ट ने अदालती आदेश के बावजूद भी चारागाह भूमि से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई नहीं करने पर टोंक कलेक्टर चिन्मयी गोपाल को अवमानना के कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है. जस्टिस पंकज भंडारी और जस्टिस समीर जैन की खंडपीठ ने यह आदेश मालपुरा निवासी छीतर लाल शर्मा की अवमानना याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए दिए अवमानना याचिका में अधिवक्ता लक्ष्मीकांत शर्मा ने अदालत को बताया कि टोंक जिले की मालपुरा उपखंड के धौला का खेड़ा गांव की करीब छह सौ बीघा से अधिक जमीन पर प्रभावशाली लोगों ने कब्जा कर रखा है। 

आपको बता दें कि विभाग की ओर से कार्रवाई नहीं करने पर याचिकाकर्ता की ओर से पूर्व में हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी, जिस पर सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने गत तीन जनवरी को याचिकाकर्ता को कहा था कि वह कलेक्टर की अध्यक्षता में गठित पब्लिक लैंड प्रोटेक्शन सेल के समक्ष अपनी शिकायत दर्ज कराए। 

वहीं अदालत ने पीएलपीसी को भी निर्देश दिए थे कि वह याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन पर दो माह में कार्रवाई करें. अवमानना याचिका में कहा गया कि याचिकाकर्ता की ओर से कलेक्टर के समक्ष इस संबंध में अपना अभ्यावेदन पेश किया जा चुका है। राजस्व अधिकारियों ने इस चारागाह भूमि को अतिक्रमण मुक्त करने के बजाए फौरी तौर पर ही कार्रवाई की, जबकि आज भी यहां प्रभावशाली लोगों ने पक्का निर्माण कर कब्जा कर रखा है।  

साथ ही वहीं कुछ अतिक्रमी यहां अवैध खनन के साथ ही फसलों की बुआई भी कर रहे हैं. याचिकाकर्ता की ओर से कलेक्टर को कई बार शिकायत भी दर्ज कराई गई, लेकिन कलेक्टर ने उस पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की. ऐसे में कलेक्टर को अदालती आदेश की अवहेलना करने पर दंडित किया जाए, जिस पर सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने कलेक्टर को अवमानना नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।  

मूल ऑनलाइन लेख - https://zeenews.india.com/hindi/india/rajasthan/jaipur/encroachment-is-not-being-removed-even-after-the-order-of-the-collector/1364388

Monday, 25 July 2022

सीमा ज्ञान:चरागाह जमीन का सीमा ज्ञान, मेड़बंदी का काम शुरू

 दौसा

रानोली ग्राम पंचायत कठमाना के अरनियाकांकड गांव में 400 बीघा चरागाह की जमीन पर प्रभाव शाली लोगों द्वारा कब्जा कर रखा था। जिससे गरीब परिवार के लोगों को जीवन यापन करने में परेशानी उठानी पड़ रही थी। गांव के कुछ लोगों ने गांव के चारागाह भूमि से अतिक्रमण हटाने की मांग को लेकर हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी।

जिस पर हाईकोर्ट ने जिला एवं उपखंड प्रशासन को चारागाह भूमि पर से अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया। कठमाना सरपंच गणेश चौधरी ने बताया कि पंचायत प्रशासन ने चारागाह भूमि से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई पूरी कर दी है। अब मेड़बंदी का कार्य शुरू किया जाएगा। इस मौके पर वार्ड पंच लादूराम चौधरी, भंवर पडियार, बेनाम सरकार, नोरत मल जाट, जीतराम जाट, दामोदर जांगिड़, भरत मीणा आदि मौजूद रहे।

Wednesday, 8 June 2022

पब्लिक लैंड प्रोटेक्शन सेल: आम लोगों के लिए एक नई उम्मीद

विवादों के निबटान और अतिक्रमण का शिकार हुए ज़मीनों को वापस समुदायों को दिलवाने के अलावा पब्लिक लैंड प्रोटेक्शन सेल सार्वजनिक भूमियों के संचालन और प्रबंधन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

पूजा चंद्रन, सुब्रता सिंह

June 8, 2022

सार्वजनिक भूमि ऐसे प्राकृतिक संसाधन होते हैं जिनका इस्तेमाल समुदाय के लोग सार्वजनिक हितों के लिए करते हैं। इनमें जंगल, चारागाह, तालाब और कूड़ा इकट्ठा (वेस्टलैंड) करने वाली जगहें होती हैं। ये ग़ैर-नक़द, ग़ैर-बाज़ार अर्थव्यवस्थाओं के लिए उपलब्ध संसाधनों का आधार होती हैं। ऐसी ज़मीनें स्थानीय लोगों के ईंधन, पानी, तेल, मछली, जड़ी-बूटी, विभिन्न प्रकार की फल-सब्ज़ियों के अलावा उनके पशुओं के लिए चारा आदि की ज़रूरतें पूरी करती हैं। विभिन्न अध्ययन बताते हैं कि ग्रामीण घरों की कुल आय में आम ज़मीन से होने वाली आय का योगदान 12 से 23 प्रतिशत के बीच होता है। कार्बन के क्षेत्र में भी इन ज़मीनों का योगदान होता है और ये जैव विविधता के भंडार और देशी ज्ञान की निशानियों में बदल जाती हैं।

भारत में सार्वजनिक भूमि के क्षेत्रफल में लगातार कमी आ रही है। 2005 से 2015 के बीच अकेले चारागाह के रूप में प्रयुक्त होने वाली ज़मीन पहले से 31 प्रतिशत कम हुई है। औद्योगीकरण की तेज गति से इन जमीनों पर पड़ने वाला बोझ बढ़ा है। लोग अब इनका उपयोग घर-मकान बनाने के साथ-साथ खेती में करने लगे हैं। इसके अलावा ‘उर्वर’ ज़मीनों की गहरी खुदाई से आसपास का परिदृश्य भी तेज़ी से बदल रहा है।इन सबमें एक नई जुड़ी चीज़ है भारत का स्वच्छ ऊर्जा संक्रांति (क्लीन एनर्जी ट्रैंज़िशन)। 


अस्पष्ट सीमाएँ महँगी और अपूर्ण प्रवर्तन की स्थिति पैदा करती हैं और भूमि और सम्पत्ति क़ानूनों में अतिच्छादन इस समस्या को कई गुना और अधिक बढ़ा देती है। | चित्र साभार: फ़ाउंडेशन फ़ॉर एकोलॉजिकल सिक्योरिटी (एफ़ईएस)

निजी ज़मीनों की तुलना में सार्वजनिक ज़मीनों का क़ानूनी रूप से मान्यता प्राप्त होने की सम्भावना कम होती है। इसलिए सार्वजनिक जगहों का अतिक्रमण और उस पर निजी स्वामित्व का दावा करना बहुत आसान हो जाता है। अस्पष्ट सीमाएँ महँगी और अपूर्ण प्रवर्तन की स्थिति पैदा करती हैं और भूमि और सम्पत्ति क़ानूनों में अतिच्छादन इस समस्या को कई गुना और अधिक बढ़ा देती है। इस समस्या से निपटने के लिए 28 जनवरी 2011 को भारत के सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में सार्वजनिक संसाधनों के संरक्षण के लिए एक व्यवस्था को सक्रिय बनाने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए एक ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया। जगपाल सिंह और अन्य बनाम पंजाब सरकार और अन्य नाम वाले मामले में कोर्ट ने सार्वजनिक ज़मीनों के सामाजिक-आर्थिक महत्व को मान्यता देते हुए राज्य सरकारों को अतिक्रमण हटाने के लिए योजनाएँ तैयार करने का निर्देश दिया। उसके बाद गाँव के सार्वजनिक उपयोग के लिए ऐसी सभी ज़मीनों को ग्राम पंचायत को वापस करना था।

इस फ़ैसले से ग्रामीण समुदायों में अपनी उन सभी ज़मीनों को वापस पाने की आशा जाग गई जो अतिक्रमण के कारण उनसे छिन गई थीं। इसके अलावा इस फ़ैसले ने मनरेगा जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से सार्वजनिक संसाधनों की सुरक्षा, प्रबंधन और बहाली के लिए राज्य सरकारों को तंत्र विकसित करने के लिए भी प्रेरित किया। इसने लोअर कोर्ट के लिए देश में सार्वजनिक ज़मीनों पर न्यायशास्त्र विकसित करने के शुरुआती बिंदु के रूप में भी काम किया है।

पब्लिक लैंड प्रोटेक्शन सेल क्या हैं?

राजस्थान और मध्य प्रदेश में कुल भूमि का क्रमश: 36 प्रतिशत और 37 प्रतिशत हिस्सा सार्वजनिक भूमि का हिस्सा है। ज़मीन के ये टुकड़े लाखों ग्रामीणों के आत्म-सम्मान, सुरक्षा और आजीविका का साधन हैं। राज्य की अदालतों में सरकारों के अतिक्रमण के ख़िलाफ़ दायर की जाने वाली जन हित याचिकाओं का अम्बार है। इसे ध्यान में रख कर और जगपाल सिंह फ़ैसले के नक़्शे कदम पर चलते हुए 2019 में राजस्थान हाई कोर्ट ने और 2021 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपनी अपनी राज्य सरकारों को पब्लिक लैंड प्रोटेक्शन सेल (पीएलपीसी) नाम के स्थाई संस्थानों की स्थापना के निर्देश दिए। इन प्रकोष्ठों में ग्रामीण इलाक़ों में किए गए सार्वजनिक भूमि अतिक्रमण से जुड़ी शिकायतें आती हैं और यह क़ानूनी प्रक्रियाओं के तहत इन मामलों को निबटाकर उन्हें ग्राम सभा या ग्राम पंचायत को वापस लौटाते है।

आज की तारीख़ में दोनों राज्यों के प्रत्येक ज़िले में दो पीएलपीसी की स्थापना हो चुकी है जिसका प्रमुख ज़िले का कलेक्टर होता है। भारत के दो तिहाई से अधिक अदालती मुक़दमे ज़मीन या सम्पत्ति से जुड़े होते हैं और इनमें ज़्यादातर मामले सार्वजनिक भूमि के हैं। ऐसी स्थिति में पीएलपीसी जैसे संस्थानों की स्थापना इन मामलों में एक स्वागत योग्य हस्तक्षेप है। पीएलपीसी में समुदाय के लोग सीधे तौर पर अपनी सार्वजनिक ज़मीन के मामले का बचाव कर सकते हैं और ज़मीन से जुड़े नियमों और विधानों की जटिलता से बच सकते हैं। इससे पेशेवर क़ानूनी सहायता लेने या अदालत के शुल्क का भुगतान करने में कमी आती है। जिसके कारण आबादी का एक बड़ा हिस्सा काफ़ी कम खर्च में अपने क़ानूनी संसाधनों को वापस हासिल कर लेता है। मुद्दों से निबटने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था को संस्थागत करने से बहुत जटिल और खर्चीले अदालती तामझाम से बचा जा सकता है और साथ ही न्यायालय के कार्यभार को कम किया जा सकता है। वर्तमान में उच्च न्यायालय केवल उन मामलों की सुनवाई करता है जिसमें पीएलपीसी किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं करते हैं; एक प्रहरी की भूमिका में रहकर न्यायिक प्रक्रियाओं को नियमों का पालन करने और इन प्रकोष्ठों की जवाबदेही सुनिश्चित करने की अनुमति मिलती है। 

पीएलपीसी को और अधिक असरदार कैसे बनाया जा सकता है?अपनी शुरुआती अवस्था में होने के बावजूद पीएलपीसी क़ानूनी जानकारियों को लोकतांत्रिक बनाने, न्याय दिलवाने और अतिक्रमण के मामलों का तेज़ी से निवारण करने में सहायक साबित हो रहे हैं। हालाँकि अतिक्रमण के मामलों के निबटारों के अलावा पीएलपीसी सार्वजनिक भूमि के प्रबंधन और संचालन में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं इसलिए इस विषय पर गम्भीरता से सोचने की ज़रूरत है।

‘ज़मीन’ राज्यों के दायरे में आने वाला विषय है। किसी भी सार्वजनिक भूमि पर जब तक पहले से किसी सरकारी विभाग विशेष (जैसे कि वन विभाग) का मालिकाना हक़ नहीं होता है तब तक क़ानूनी रूप से ज़मीन के उस टुकड़े को ‘सरकारी ज़मीन’ के उपवर्ग (सबसेट) के दायरे में ही रखा जाता है। भूमि रिकॉर्ड के सर्वेक्षण, रिकॉर्ड के रखरखाव की ज़िम्मेदारी भी राज्य के राजस्व विभागों की होती है। इसके साथ ही, पंचायती राज व्यवस्था ग्राम पंचायतों को गाँव की आम भूमि के प्रबंधन और संरक्षण का दायित्व सौंपती है।

हालाँकि, अनुभवों से यह स्पष्ट होता है कि जहां स्थानीय स्तर पर पहुँच और उपयोग के अधिकारों को मान्यता दी जा चुकी है वहीं इन्हें औपचारिक रूप से दर्ज नहीं किया जाता है। स्थाई दस्तावेज़ों की सूची में आने के बाद भी आम ज़मीनों से जुड़ी जानकारियाँ नियमित रूप से अपडेट नहीं की जाती हैं। उनकी सीमाओं की स्थानिक पहचान भी ग़ायब हो चुकी हैं। इस तरह की जानकारी सम्बन्धी सूचनाओं की कमी से समुदायों का अपनी ज़मीन पर किया जाने वाले दावे कमजोर हो जाते हैं। इससे सार्वजनिक भूमि का दुरुपयोग शुरू हो जाता है और लोग उसे नज़रअन्दाज़ करने लगते हैं। नतीजतन बिना किसी ज़ोर ज़बरदस्ती के उन ज़मीनों पर निजी अतिक्रमण को बढ़ावा मिल जाता है। नियमित रूप से सुचारु पीएलपीसी इनमें से कुछ बाधाओं को दूर करने की कोशिश कर सकता है और सुधारवादी कदम के बजाय अतिक्रमण को रोकने पर ध्यान केंद्रित कर सकता है। जैसे कि सार्वजनिक भूमि की व्यापक पहचान, सर्वेक्षण और सीमांकन के लिए एक मज़बूत कदम उठाना और भूसम्पत्ति मानचित्र तैयार करना। ज़मीन से जुड़े रिकॉर्ड में पूरी तरह से सुधार चाहने वाला डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड मॉडर्नाईजेशन प्रोग्राम भी ज़मीन पर निजी स्वामित्व और अधिकार पर केंद्रित है। नवीनतम स्वामित्व योजना में से भी सार्वजनिक भूमि को हटा दिया गया है। इस योजना में आबादी वाले ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वेक्षण करने और भूमि के कार्यकाल को औपचारिक रूप देने के लिए ड्रोन तकनीक का उपयोग किया जाता है। पीएलपीसी भी सार्वजनिक संसाधनों के मुफ़्त उपयोग और स्थानिक रूप से संदर्भित आँकड़े तैयार करने और उन्हें भूमि प्रशासन के सामने लाने के लिए ऐसे ही तरीक़ों का इस्तेमाल कर सकता है। उसके बाद वे इस तैयार आँकड़ों को पंचायत में पंजीकृत सम्पत्तियों से जोड़ कर, सामाजिक ऑडिट के लिए आधार तैयार कर सकते है और अतिक्रमण पर निगरानी रखने के लिए आधार रेखा का काम कर सकते हैं।

हाल ही में राज्य में बड़े पैमाने पर हुए अतिक्रमण से निपटने के लिए मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडू सरकार को यह निर्देश दिया कि वह राज्य की सभी जल निकायों की उपग्रहीय (सेटेलाइट से) तस्वीरें लें और इन्हें प्रत्येक ज़िले के एक संदर्भ बिंदु के रूप में उपयोग में लाएँ ताकि उन संसाधनों को यथावत सुरक्षित रखा जा सके। पीएलपीसी इस ज़िम्मेदारी को डिज़ाइन के माध्यम से पूरा कर सकते हैं।

सार्वजनिक संसाधनों के उत्तरदायी शासन की स्थिति को हासिल करने के लिए अतिक्रमण को अपने केंद्र में रखने वाले क़ानूनी दृष्टिकोण के ऊपर से नीचे के नियम (टॉप-डाउन क़ानून) की प्रभावशीलता का मूल्यांकन ज़रूरी है। ज़मीन एक राजनीतिक मुद्दा है। संसाधनों से युक्त ज़मीन का एक सार्वजनिक टुकड़ा सार्वजनिक पूँजी होता है और इसमें सामाजिक सामंजस्य और सद्भाव के गुण निहित होते हैं। इसलिए इन संसाधनों के प्रबंधन में पीएलपीसी पंचायतों और ग्राम संस्थाओं को समर्थन देने वाली और अधिक प्रभावी तरीक़ों पर अपना ध्यान केंद्रित कर सकता है। समस्याओं के निबटान के लिए एक सहायक शाखा के रूप में सामाजिक सम्बन्धों को बेहतर करने के क्षेत्र में काम करने से अधिक न्यायपूर्ण परिणाम हासिल हो सकते हैं।

https://hindi.idronline.org/article/public-land-protection-cells-a-new-hope-for-indias-common-lands/