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Thursday, 7 August 2025

ग्रामीणों की चरागाह भूमि पर अतिक्रमण की शिकायत:ग्रामीणों ने एसडीएम को सौंपा शिकायत पत्र, मुक्त करवाने की मांग की

कुम्भलगढ़ तहसील के कोलपीपली, कैलवाड़ा और गंगलाया गांव के निवासियों ने उपखंड अधिकारी को एक शिकायत पत्र सौंपा है। इसमें ग्राम केलवाड़ा की चरागाह भूमि पर अवैध अतिक्रमण का मामला उठाया गया है।

शिकायत में बताया-यह 12.6090 हेक्टेयर की चरागाह भूमि कोलपीपली के पास स्थित है। इस भूमि का उपयोग कोलपीपली, केलवाड़ा और गंगलाया गांव के पशुओं के चरने के लिए किया जाता है। ग्रामीणों का आरोप है कि कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों और होटल मालिकों ने इस चरागाह भूमि पर अवैध रूप से कब्जा कर लिया है।

ग्रामवासियों का कहना है कि इन लोगों ने चरागाह भूमि में अनधिकृत रूप से रास्ता निकाल दिया है, जबकि पहले वहां कोई रास्ता नहीं था। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि अब ये लोग पक्का रास्ता भी बनाना शुरू कर चुके हैं। ग्रामीणों को डर है कि अगर इस अतिक्रमण को जल्द नहीं रोका गया तो पूरी चरागाह भूमि पर कब्जा हो जाएगा। इससे उनके पशुओं के चरने की जगह नहीं बचेगी। ग्रामीणों उपखंड अधिकारी से कहा कि चरागाह भूमि से अतिक्रमण हटवाया जाए और अवैध रूप से बनाए गए रास्ते को बंद करवाया जाए।

मूल ऑनलाइन लेख - https://www.bhaskar.com/local/rajasthan/rajsamand/kumbhalgarh/news/complaint-of-encroachment-on-pasture-land-of-villagers-135624429.html

Thursday, 13 March 2025

नाथद्वारा विधायक ने होटल और रिसॉर्ट के नाम पर जंगलों की कटाई का मुद्दा उठाया

 नाथद्वारा, कुंभलगढ़, उदयपुर और माउंट आबू में पर्यटन विस्तार के नाम पर खत्म हो रहे जंगल :विधायक विश्वराज सिंह मेवाड़

जयपुर / राजसमंद 13 मार्च 2025 । नाथद्वारा विधायक विश्वराज सिंह मेवाड़ ने राजस्थान विधानसभा में पर्यटन को विस्तार देने के नाम पर जंगलों की अंधाधुन कटाई पर विधानसभा में गंभीर मुद्दा उठाया है।

उन्होंने कहा है कि पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर प्रकृति का विनाश किया जा रहा है। पर्यटन के बाजार में पर्यावरण, इतिहास और शहर नीलाम हो रहे हैं। सिद्धांतों को ताक पर रख कर उदयपुर, नाथद्वारा, कुंभलगढ़ आदि क्षेत्र में जंगलों की कटाई होकर होटल और रिजॉर्ट बनाए जा रहे हैं। मगरे, जंगल, पर्यावरण और वनीकरण के सिद्धांतों को ताक पर रख कर किया जा रहा विकास कहां तक स्वीकार्य है। विश्व में सिर्फ 31 वेटलैंड शहर हैं जिनमें एक उदयपुर भी है, लेकिन यहां भी वेटलैंड से जुड़े नियमों का पालन होता दिखाई नहीं देता।

एक महत्वपूर्ण प्रकरण का जिक्र करते हुए विधायक मेवाड़ ने कहा कि वर्ष 1970 में उदयपुर कलक्टर के आदेश से 50 बीघा भूमि चारगाह से बिलानाम दर्ज करने की स्वीकृति दी गई। आदेश से यह भूमि नाथद्वारा नगरपालिका को सुपुर्द कर दी गई। 1973 में 765 बीघा 16 बिस्वा चारागाह भूमि को वन विभाग को हस्तांतरण कर दी। यह नामांतरण तहसीलदार द्वारा दस साल बाद 1983 को ही किया गया और उल्लेखनीय है कि इस नामांतरण में नगरपालिका को आबादी विस्तार हेतु वर्णित 50 बीघा भूमि भी शामिल की गई। वन भूमि में से 1993 को 286 बीघा और 18 बिस्वा को अनाधिकृत क़ब्ज़ा माना गया और न्यायालय वन बंदोबस्त अधिकारी उदयपुर के 2006 निर्णय में इस 286 बीघा 18 बिस्वा को भी वन क्षेत्र में गिना गया। राजस्व मंडल न्यायालय ने 22 अगस्त 2019 को निर्णय दिया कि भूमि आबादी विस्तार की या वन क्षेत्र की भूमि है, इसका प्रकरण राजस्थान सरकार के दो विभागों के मध्य का है एवं प्रकरण को नियमानुसार निस्तारण के लिए मुख्य सचिव राजस्थान सरकार जयपुर को भिजवाया जाए।

इन सभी गतिविधिर्यो का परिणाम यह हुआ कि अतिक्रमण तो है ही लेकिन जिस जगह के लिए निवासियों को नगरपालिका ने पट्टे जारी किए, वे वन क्षेत्र में गिने जा रहे है। प्रशासन के कार्य और शासन की अनदेखी के कारण इन प्रभावित लोगों को नुक़सान पहुँचा है। दोहरी नीति भी यहाँ स्पष्ट है, बिना कोई ठोस कारण के सरकारी इ‌मारत ग्रीन बेल्ट में बन सकती है, होटल भी फारेस्ट, ग्रीन बेल्ट, तालाबों किनारे बन सकते हैं, लेकिन पट्टा शुदा निवासियों को 55 साल भी न्याय के लिए काफी नहीं हैं।

सरकार से आग्रह है कि शासन की संवेदशीलता से प्रशासन से, प्रशासन के कार्य को सुधारें ताकि लोगों को अपना हक मिल सके 1970 से 2025, यह कोई कम समय नहीं है।

विधानसभा में संबोधित करते हुए मेवाड़ ने कहा कि 1961 में राजस्थान का वन क्षेत्र 39,420 वर्ग किमी था जो कि 2019 - 20 में 32,845.3 वर्ग किमी रह गया। जिस तरह से वन क्षेत्र लगातार घट रहे हैं यह वन विभाग की कार्यशैली बताता है लेकिन वन क्षेत्र घटना केवल वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं है सभी विभागों की जिम्मेदारी है जिनके माध्यम से अलग-अलग कार्य होते हैं।

उन्होंने आगे पर्यावरण पर चर्चा करते हुए कहा कि दुनिया भर में पर्यावरण के लिए नीतियां हैं जो दुनियाभर मानती है खास तौर से यह कि हमको पर्यावरण के प्रति सावधानी रखनी चाहिए जहां नुकसान हो रहा है वहां नुकसान बंद करना चाहिए जो नुकसान कर रहा है उसे भरपाई करनी चाहिए। पर्यावरण किसी एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं सब विभागों को साथ मिलकर पर्यावरण संभालना चाहिए।

वनीकरण भी पर्यावरण का ही भाग है और इसके भी कुछ सिद्धांत है जो दुनिया भर में माने गए हैं।

उन्होंने आगे बताया कि राजस्थान सरकार की जो बजट है यह पहला ग्रीन बजट है और ग्रीन बजट का उद्देश्य ही पर्यावरण को संभालना है और जो लोग पर्यावरण के प्रति काम करते हैं उनके लिए भी लाभदायक पहल है। अगर हम यह सब सिद्धांत ध्यान में रखते हुए कम करें तो सफलता क्यों न प्राप्त हो। लेकिन पिछले कुछ दशकों में देखा जाए तो जहां ज्यादा हरियाली है वहां सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है।

उन्होंने पर्यटन उद्योग पर चर्चा करते हुए कहा कि जहां पर्यटन उद्योग से जंगलों को नुकसान पहुंचा है, अगर जंगल ही नहीं बचेंगे तो पर्यटक देखेंगे क्या? उन्होंने बताया कि जिस तरह उदयपुर को झीलों और बगीचों के लिए जाना जाता था वहां आज एक भी तालाब और बगीचा साफ नहीं दिखाई देते हैं। जिस तरह से तालाबों के किनारे होटल, रेस्टोरेंट और मगरे पर सरकारी भवन बना रहे हैं, और जहां हरियाली बची हुई है वहां और होटल बन रही है, उनकी सहूलियत के लिए और रास्ते बना रहे हैं इसे मैं हरियाली तो कहीं रही ही नहीं है।

दुनिया में कई शहर जिन्हें वेटलैंड घोषित किया गया है और हाल ही में उदयपुर को भी वेटलैंड घोषित किया गया, लेकिन वेटलैंड के कानून मानने के लिए कोई तैयार ही नहीं है। पर्यटन के बाजार में नीलाम हो गया है। माउंट आबू की दुर्दशा की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कुंभलगढ़ की दशा बताते हुए कहा कि कुंभलगढ़ जो जंगलों से उभरा हुआ है किला था बहुत जल्द से होटल से उभरा हुआ नजर आएगा। हल्दीघाटी जो एक रण क्षेत्र है वहां इमारत बनाई जाएगी तो वहां का वातावरण खराब हो जाएगा जिन्होंने बलिदान दिया उनका निरादर होगा।

नाथद्वारा का आप देखेंगे तो अब हर पहाड़ हर मगरे पर रास्ते बन रहे हैं, मार्ट बन रहे हैं, हम स्कूल में तो पेड़ लगाते हैं बच्चों को सिखाते हैं लेकिन उनको अपनी नजर ऊपर घुमानी है वह देखेंगे मगरों का तो कत्ल हो रहा है। इन सब चीजों पर ध्यान देना चाहिए और अगर आवश्यकता हो तो नीतियों को भी बदलना चाहिए।

मूल ऑनलाइन लेख: - https://udaipurtimes.com/news/raised-issue-of-deforestation/cid16362064.htm

Friday, 28 February 2025

उच्च न्यायालय का अहम आदेश: एसडीएम को चरागाह भूमि से अतिक्रमण हटवाने और पुलिस जाब्ता मुहैया कराने का निर्देश

 प्रशासन की लापरवाही के कारण बेशकीमती सरकारी जमीन और गांवों की चरागाह भूमि पर अतिक्रमण के मामले में आखिरकार उच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप किया।

कुंभलगढ़: प्रशासन की लापरवाही के कारण बेशकीमती सरकारी जमीन और गांवों की चरागाह भूमि पर अतिक्रमण के मामले में आखिरकार उच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप किया। क्षेत्र की ग्राम पंचायत आंतरी के राजस्व गांव संदूको का गुड़ा में स्थित 500 बीघा गोचर भूमि पर कुछ लोगों द्वारा किए गए अतिक्रमण को हटवाने के लिए न्यायालय ने कड़ा आदेश दिया।

ग्रामीणों का संघर्ष और अदालत की शरण
संदूको का गुड़ा की इस गोचर भूमि पर अतिक्रमण को लेकर गांववासियों ने वर्ष 2020 से लगातार शिकायतें की थीं, लेकिन प्रशासन ने इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। ग्रामीणों ने पंचायत, पंचायत समिति और उपखंड अधिकारी से कई बार गुहार लगाई, लेकिन कोई हल नहीं निकला। तब, न्याय की उम्मीद में ग्रामीणों ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

उच्च न्यायालय ने दिया एसडीएम को आदेश
ग्राम वासियों की ओर से वकील ऋतुराज सिंह राठौड़ ने न्यायालय में याचिका दायर की, जिसमें यह बताया गया कि संदूको का गुड़ा की गोचर भूमि पर अतिक्रमण किया गया है, और इसके बावजूद प्रशासन की ओर से कोई कार्रवाई नहीं की गई। अदालत ने इस पर गंभीरता से विचार करते हुए 24 फरवरी को कुंभलगढ़ के उपखंड अधिकारी को आदेश दिया कि गोचर भूमि से अतिक्रमण हटाया जाए और इसके लिए पंचायत को पुलिस जाब्ता उपलब्ध कराया जाए ताकि मौके पर कार्रवाई की जा सके।

अतिक्रमण की रिपोर्ट और कार्रवाई का आग्रह
याचिका में यह भी बताया गया कि ग्राम पंचायत आंतरी की ओर से अतिक्रमियों को पत्र लिखकर चेतावनी दी गई थी कि गोचर भूमि पर किए जा रहे निर्माण कार्य अवैध हैं, लेकिन इसके बावजूद कार्रवाई नहीं हुई। इसके अलावा, नवंबर 2024 में पब्लिक लैंड प्रोटेक्शन सेल के अध्यक्ष कलक्टर राजसमंद को भी इस मामले की सूचना दी गई, लेकिन अतिक्रमण हटाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया।

मूल ऑनलाइन लेख: -https://www.patrika.com/rajsamand-news/important-order-of-the-high-court-instructions-to-sdm-to-remove-encroachment-from-pasture-land-and-provide-police-force-19429228