Tuesday, 9 September 2025

देवगढ़ में चारागाह जमीन पर अवैध कब्जे का मामला:सरपंच और पटवारी पर मिलीभगत का आरोप, ग्रामीणों ने एसडीएम को सौंपा ज्ञापन


भवानीमंडी के ग्राम पंचायत आवर के देवगढ़ में चारागाह भूमि पर अवैध अतिक्रमण का मामला सामने आया है। ग्रामीणों ने इस संबंध में एसडीएम श्रद्धा गोमे को ज्ञापन सौंपा है।

ग्रामीणों का आरोप है कि ग्राम पंचायत आवर के सरपंच विमल जैन और भू-अभिलेख निरीक्षक और पटवारी की मिलीभगत से यह अतिक्रमण किया गया है। आरोपियों ने चारागाह भूमि पर तार बाउंड्री लगाकर कब्जा कर लिया है।

इससे पहले ग्रामीणों ने दो बार पचपहाड़ तहसीलदार को भी ज्ञापन सौंपा था। प्रशासन ने कार्रवाई की, लेकिन रसूखदार लोगों के अतिक्रमण को नहीं हटाया। इसके बजाय एससी वर्ग के गरीब लोगों के छोटे-छोटे अतिक्रमण हटा दिए गए। चारागाह भूमि पर बड़े अतिक्रमण अभी भी मौजूद हैं।

ग्रामीणों ने एसडीएम से नामजद लोगों द्वारा किए गए अतिक्रमण को हटाने की मांग की है।

मूल ऑनलाइन लेख - https://www.bhaskar.com/local/rajasthan/jhalawar/bhawani-mandi/news/case-of-illegal-occupation-of-pasture-land-in-devgarh-135877345.html

लालसोट में चरागाह भूमि से अतिक्रमण हटाया:50 बीघा जमीन पर अवैध रूप से बोई फसल नष्ट की

लालसोट क्षेत्र में राहुवास तहसील के निचुनिया गांव में राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश पर बड़ी कार्रवाई की गई। प्रशासन ने पुलिस की मौजूदगी में चारागाह भूमि से अतिक्रमण हटाया।

अतिक्रमणकारियों ने करीब 50 बीघा भूमि पर गवार, बाजरा, मूंगफली और तिल की फसल बो रखी थी। प्रशासन ने ट्रैक्टरों से इन फसलों को नष्ट कर भूमि को खाली करवाया। अतिक्रमणकारियों को भविष्य में सरकारी भूमि पर कब्जा न करने की चेतावनी दी गई।

तहसीलदार महेश चंद शर्मा के अनुसार, यह कार्रवाई भू राजस्व अधिनियम की धारा 91 के तहत की गई। मामले में पहले नायब तहसीलदार रामगढ पचवारा ने 30 अगस्त 2017 को और अतिरिक्त जिला कलेक्टर दौसा ने 27 नवंबर 2017 को निर्णय दिया था। अतिक्रमणकारियों ने इसके खिलाफ संभागीय आयुक्त जयपुर में अपील की थी।

न्यायालय ने 8 अक्टूबर 2024 को अपील खारिज कर दी। इसके बाद ग्राम निचूनियां की भूमि खसरा नंबर 199/18 किस्म चारागाह और खसरा नंबर 191/17 सिवायचक भूमि से अतिक्रमणकारियों को बेदखल करने का आदेश दिया गया। इसके अलावा खसरा नंबर 16, 19, 178/6, चारागाह और गैर मुमकिन नाला पर भी अतिक्रमण पाया गया।

कार्रवाई के दौरान गिरदावर हरिनारायण, पटवारी मुरारी, कमलेश, किरण सहित राजस्व कर्मी और पुलिस बल मौजूद रहे। यह कार्रवाई सोमवार की देर शाम तक चली।

मूल ऑनलाइन लेख - https://www.bhaskar.com/local/rajasthan/dausa/lalsot/news/encroachment-removed-from-pasture-land-in-lalsot-135875731.html

 

Monday, 8 September 2025

ब्लॉक में 3635 हैक्टेयर गोचर भूमि, कब्जा कर की जा रही खेती, घटना के बाद प्रशासन करता है कार्रवाई

 शिकायतों के बाद भी नहीं दिया जाता ध्यान, हर जगह बनाई जा सकती हैं गोशाला, चारागाह

देवल पंचायत अंतर्गत गोचर जमीन

बीना. गांवों में पहले गोवंश को घास उपलब्ध कराने गोचर भूमि छोड़ी जाती थी, लेकिन अधिकारियों द्वारा ध्यान ना दिए जाने पर धीरे-धीरे लोगों ने भूमि पर कब्जा कर खेती शुरू कर दी है। विवाद होने पर अधिकारी कार्रवाई करने के लिए पहुंचते हैं। गोचर भूमि खाली ना होने से गोवंश को चरने के लिए जगह नहीं है, जिससे गोवंश सडक़ों पर घूम रहा है।

राजस्व रिकॉर्ड में 3635 हैक्टेयर गोचर भूमि है, जिसमें तहसील के भानगढ़ क्षेत्र में गोचर भूमि सबसे ज्यादा है, जहां अलग-अलग गांव में कुल 1 हजार 875 हैक्टेयर जमीन है। इसके साथ ही मंडीबामोरा क्षेत्र में 868 हैक्टेयर भूमि, बीना क्षेत्र में 891 हेक्टेयर भूमि है। देवल गांव में 400 एकड़ गोचर भूमि है, जिसपर गो-अभ्यारण बनना है और यहां वर्तमान में इस भूमि पर लोग खेती करते हैं। शिकायतों के बाद भी अधिकारी कार्रवाई नहीं करते हैं। ग्राम पंचायत ढिमरौली की सरपंच ने करीब 25 एकड़ भूमि जो अलग-अलग खसरा नंबर की है, उसपर कब्जा होने की शिकायत कई माह पहले की थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। जमीन पर रबी फसल की बोवनी की गई थी।

नहीं बन पाए चारागाह

करीब पांच वर्ष पूर्व शासन ने हर पंचायत में एक हैक्टेयर जमीन पर चारागाह बनाने के आदेश किए थे, जिसकी लागत सात लाख रुपए थी और यह कार्य मनरेगा से होना था, लेकिन गोचर भूमि ना मिलने पर चारागाहों का निर्माण नहीं हो सका। यदि चारागाह बन जाते, तो पशुपालकों को परेशानी नहीं होती।

सड़कों पर बैठ रहे मवेशी

गोचर भूमि खाली ना होने के कारण आवारा मवेशी सडक़ों पर बैठ रहे हैं, जिससे वाहन चालक और किसान सभी परेशान हैं। यदि गोचर भूमि से अतिक्रमण हट जाए, तो यह समस्या हल हो सकती है।

एसडीएम ने किया निरीक्षण

देवल सरपंच की हत्या के मामले में गोचर जमीन पर कब्जा की बात सामने आने पर एसडीएम विजय डेहरिया ने रविवार को निरीक्षण किया। उन्होंने बताया कि गोचर भूमि पर रबी सीजन में लोग बोवनी करते हैं। खरीफ फसल की बोवनी नहीं हुई है। सोवरन और उसके चाचा का कब्जा बताया गया है। कोटवार को हिदायत दी गई है कि रबी सीजन में कोई भी कब्जा करता है, तो तत्काल सूचना दी जाए, उसपर कार्रवाई की जाएगी। क्षेत्र में अन्य जगहों पर भी कब्जा हटाने की कार्रवाई की जाएगी।

मूल ऑनलाइन लेख - https://www.patrika.com/sagar-news/there-are-3635-hectares-of-grazing-land-in-the-block-farming-is-being-done-by-occupying-it-administration-takes-action-after-the-incident-19927156


Thursday, 4 September 2025

कोटड़ी में गौशाला की 400 बीघा चारागाह भूमि पर कब्जा:300 गायों के चरने की जगह नहीं, ग्रामीणों ने एसडीएम को सौंपा ज्ञापन

 

झालावाड़ में चारागाह भूमि को अतिक्रमण हटाने की मांग को लेकर ग्रामीणों ने उपखंड अधिकारी को ज्ञापन सौंपा।

झालावाड़ के पिड़ावा में श्री कृष्ण गोशाला कोटड़ी की चारागाह भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराने की मांग उठी है। सरपंच हरिराम गोचर के नेतृत्व में ग्रामीणों ने उपखंड अधिकारी को ज्ञापन सौंपा।

ग्राम पंचायत कोटड़ी में कुल 400 बीघा चारागाह भूमि है। इसमें से 350 बीघा पर स्थानीय और आसपास के ग्रामीणों ने अवैध कब्जा कर रखा है। श्री कृष्ण गोशाला में वर्तमान में लगभग 300 गायें हैं। अतिक्रमण के कारण इन गायों के चरने के लिए कोई जगह नहीं बची है।

ग्रामीणों ने बताया कि इस मुद्दे को लेकर पहले भी कई बार तहसीलदार और एसडीएम कार्यालय पिड़ावा में ज्ञापन दिए जा चुके हैं। लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से चारागाह भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराने की मांग की है। ज्ञापन देने के दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद थे।

मूल ऑनलाइन लेख - https://www.bhaskar.com/local/rajasthan/jhalawar/news/occupation-of-400-bigha-pasture-land-of-gaushala-in-kotri-jhalawar-rajasthan-135838032.html

Monday, 1 September 2025

'विवादित' जल निकायों की पहचान विशेषज्ञ करें, केवल राजस्व रिकॉर्ड प्रविष्टियां सत्यापन के लिए पर्याप्त नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट

राजस्थान हाईकोर्ट ने विवादित जल निकायों की पहचान और संरक्षण के लिए तकनीकी विशेषज्ञ मूल्यांकन की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि केवल राजस्व अभिलेख प्रविष्टियाँ ही पर्याप्त नहीं हैं, क्योंकि ज़मीनी हकीकत का सत्यापन सक्षम विशेषज्ञ प्राधिकारी द्वारा किया जाना आवश्यक है।

जस्टिस अनूप कुमार ढांड एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रहे थे जिसमें याचिकाकर्ता के आवंटित खनन क्षेत्र में जाने के अधिकार को राज्य सरकार ने इस आधार पर खारिज कर दिया था कि संबंधित भूमि चारागाह होने के साथ-साथ एक जल निकाय भी है।

यह देखते हुए कि ये विवादित तथ्य हैं जिनका निर्धारण न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 226 के अधिकार क्षेत्र के तहत नहीं कर सकता, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को इन प्रश्नों का पता लगाने के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया।

अदालत ने कहा,
"विवादित जल निकायों की पहचान और संरक्षण के लिए तकनीकी विशेषज्ञ मूल्यांकन की आवश्यकता है। केवल राजस्व अभिलेख प्रविष्टियाँ पर्याप्त नहीं हैं और ज़मीनी स्थितियों/वास्तविकताओं का सत्यापन सक्षम विशेषज्ञ प्राधिकारी द्वारा किया जाना चाहिए।"

याचिकाकर्ता को एक खनन क्षेत्र आवंटित किया गया था और संबंधित भूमि उस क्षेत्र में जाने का एकमात्र रास्ता थी, जिसे निजी प्रतिवादियों ने अनावश्यक अवरोध उत्पन्न करके बंद कर दिया था।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि वह पिछले 20 वर्षों से खनन क्षेत्र में जाने के लिए इन भूमियों का उपयोग कर रहा था और संबंधित ग्राम पंचायत ने भी इस संबंध में याचिकाकर्ता के पक्ष में अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी किया था।

इसके अलावा, यह भी प्रस्तुत किया गया कि ज़िला मजिस्ट्रेट ने भी खनन क्षेत्र में जाने के लिए भूमि का उपयोग करने की उनके पक्ष में सिफ़ारिश की थी। हालांकि, इन सबके बावजूद, राज्य ने याचिकाकर्ता को यह कहते हुए मंज़ूरी देने से इनकार कर दिया कि ऐसी भूमि चरागाह और जल निकाय हैं जिन्हें आवंटित नहीं किया जा सकता या उपयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

राज्य की ओर से तर्क दिया गया कि संबंधित भूमि चारागाह और "पोखर नारी भूमि" यानी एक जल निकाय है। जब प्रस्ताव ज़िला मजिस्ट्रेट के समक्ष रखा गया था, तो इस तथ्य का कहीं भी उल्लेख नहीं किया गया था कि यह भूमि एक जलग्रहण क्षेत्र है जिसे किसी को आवंटित नहीं किया जा सकता।

वकील ने आगे दलील दी कि विवादित आदेश में भी ज़िला मजिस्ट्रेट को अधीनस्थ राजस्व अधिकारियों द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों पर भरोसा न करने की चेतावनी दी गई थी और कोई भी सिफारिश करने से पहले संबंधित राजस्व रिकॉर्ड देखे जाने थे।

तर्कों को सुनने के बाद, न्यायालय ने इस बात पर प्रकाश डाला कि संबंधित भूमि का जल निकाय होना या न होना विवादास्पद है, जिस पर दोनों पक्षों द्वारा अलग-अलग तर्क दिए जा रहे हैं।

"याचिकाकर्ता के अनुसार, संबंधित भूमि पर कोई 'पोखर' या 'नारी' नहीं है, जबकि प्रतिवादियों के अनुसार, संबंधित भूमि पहाड़ों से घिरी हुई है और मानसून के मौसम में वर्षा के पानी के कारण उक्त भूमि पर मौसमी नदी बहती है।"

इस पृष्ठभूमि में, यह राय दी गई कि, "इन सभी तथ्यों पर राजस्व, वन और पंचायती राज विभागों के उच्च पदस्थ अधिकारियों वाली एक विशेषज्ञ समिति द्वारा निर्णय लिया जा सकता है, जो पुराने राजस्व अभिलेखों और मामले के व्यावहारिक ज़मीनी पहलुओं की जाँच करेगी... और फिर तदनुसार उचित निर्णय लिया जाएगा..."

अतः, न्यायालय ने राज्य को इस उद्देश्य के लिए एक "विशेषज्ञ समिति" गठित करने का निर्देश दिया।

मूल ऑनलाइन लेख-  https://hindi.livelaw.in/rajasthan-high-court/disputed-water-bodies-experts-revenue-record-entries-verification-rajasthan-high-court-302578