Saturday, 24 October 2026

सार्वजनिक भूमि पर कब्जे के मामले अब सीधे हाईकोर्ट नहीं पहुंचेंगे

नागौर

गांवों में चरागाह, तालाब-जोहड़, सार्वजनिक रास्ते, श्मशान और कब्रिस्तान जैसी सार्वजनिक जमीनों पर अतिक्रमण की शिकायतों के लिए अब जिला स्तर पर तय व्यवस्था के तहत कार्रवाई का रास्ता अपनाना होगा।

राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ऐसे मामलों में शिकायतकर्ता सार्वजनिक भूमि संरक्षण प्रकोष्ठ (पीएलपीसी) के समक्ष अभ्यावेदन दे सकते हैं। संबंधित अधिकारियों को प्रमाणित आदेश प्राप्त होने की तारीख से दो महीने के भीतर उस पर कानून के अनुसार निर्णय करना होगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य सार्वजनिक जमीन पर अतिक्रमण की शिकायतों का जिला स्तर पर निस्तारण करना और हर मामले में सीधे हाईकोर्ट आने की जरूरत कम करना है।

जोधपुर स्थित राजस्थान हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश संजय के. अग्रवाल और न्यायाधीश बलजिंदर सिंह संधू की खंडपीठ ने 14 अक्टूबर को नागौर जिले के छह लोगों की याचिका पर यह आदेश दिया। खींवसर तहसील के तांतवास गांव के सोननगर निवासी देव राम और पांच अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट को बताया गया कि हाईकोर्ट ने 30 जनवरी 2019 को जगदीश प्रसाद मीणा व अन्य बनाम राजस्थान राज्य मामले में ग्रामीण क्षेत्रों की सार्वजनिक भूमि से अतिक्रमण हटाने के लिए हर जिले में पीएलपीसी बनाने के निर्देश दिए थे। कोर्ट ने याचिका का निस्तारण करते हुए याचिकाकर्ताओं को पीएलपीसी के समक्ष अभ्यावेदन देने की छूट दी। साथ ही निर्देश दिया कि प्रमाणित आदेश प्राप्त होने की तारीख से दो महीने के भीतर उस पर नियमानुसार निर्णय किया जाए।

पुराने कब्जे से भी जमीन पर हक नहीं मिल जाता हाईकोर्ट ने अपने 2019 के आदेश में सुप्रीम कोर्ट के जगपाल सिंह बनाम पंजाब राज्य मामले का भी उल्लेख किया था। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार ग्राम सभा और पंचायत की सार्वजनिक जमीन को अवैध कब्जों से मुक्त कराकर गांव के सामुदायिक उपयोग के लिए बहाल किया जाना चाहिए। केवल लंबे समय से कब्जा होने, निर्माण पर रकम खर्च करने या राजनीतिक पहुंच होने से अवैध कब्जा वैध नहीं हो जाता। नियमितीकरण सीमित अपवादस्वरूप परिस्थितियों में और सरकार की अधिसूचना के तहत संभव है। इस मामले में हाईकोर्ट ने किसी विशेष जमीन पर अतिक्रमण साबित नहीं माना और न ही सीधे कब्जा हटाने का आदेश दिया।

याचिकाकर्ता जिला स्तर पर पीएलपीसी से शिकायत कर सकते हैं और अधिकारियों को उस पर दो महीने में निर्णय करना होगा। 2019 के आदेश के अनुसार, पीएलपीसी द्वारा कार्रवाई नहीं होने पर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने का रास्ता भी बंद नहीं है। हाईकोर्ट ने 2019 के आदेश में कहा था कि सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण की शिकायतों के बावजूद राजस्व अधिकारियों की ओर से कार्रवाई नहीं होने पर लोगों को जनहित याचिकाएं दायर करनी पड़ती हैं। इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए प्रत्येक जिले में कलेक्टर की अध्यक्षता में पीएलपीसी गठित करने और आमजन को शिकायत दर्ज कराने की जानकारी देने के निर्देश दिए गए थे। प्रकोष्ठ शिकायत की जांच उपखंड अधिकारी, तहसीलदार या नायब तहसीलदार से करवाएगा।

https://www.bhaskar.com/amp/local/rajasthan/nagaur/news/cases-of-encroachment-on-public-land-will-no-longer-reach-the-high-court-directly-dbp-139449414.html