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Monday, 25 July 2022

सामुदायिक संसाधनों से चारे की 60 प्रतिशत जरूरतें होती हैं पूरी: जोशी

सामुदायिक संसाधनों को विकसित करने की दिशा में कार्यरत फाउंडेशन फॉर ईकोलॉजिकल सिक्युरिटी के कार्यकारी निदेशक संजय जोशी ने राजस्थान जैसे राज्यों में सामुदायिक संसाधनों व पशुपालन की उपयोगिता पर डाउन टू अर्थ से विस्तार से बात की। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश:

By Bhagirath Srivas

Monday 25 July 2022



राजस्थान के उदयपुर जिले के तिरौल गांव में विकसित हुआ चारागाह ग्रामीणों की चारे की जरूरतें पूरी कर रहा है। फोटो: विकास चौधरी

क्या दुनिया पशुधन उत्पादन की पारंपरिक प्रणाली की वापसी की गवाह बनने जा रही है?

इंटरनेशल यूनियन फॉर कंसर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) की 2006 की रिपोर्ट में कहा गया था कि उत्पादन प्रणाली और उपभोग प्रणाली के रूप में पशुपालन दुनिया के लाखों गरीबों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। खासकर उनके लिए जो शुष्क इलाकों में रहते हैं और जिन्हें जलवायु अनिश्चितताओं के चलते भोजन-पानी की समस्या का सामना करना पड़ता है। अनुमानतः पशुपालन कई शुष्क-भूमि क्षेत्र वाले देशों के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में 8.8 से 20 फीसदी तक योगदान देता है। साथ ही यह कई ऐसी सेवाएं और उत्पाद उपलब्ध कराता है, जिनकी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय उपयोगिता है, जैसे जैव विविधता, पोषक-चक्र, ऊर्जा प्रवाह, कृषि में निवेश आदि।


भारत में पशुपालन करने वाले समूह आंध्र प्रदेश के शुष्क और अर्धशुष्क इलाकों से लेकर, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु के साथ- साथ उत्तर के पहाड़ी क्षेत्र और दक्षिण के नीलगिरी इलाके में मौजूद हैं। एफईएस के अनुभवों के आधार पर हम कह सकते हैं कि पशुपालन बहुत सुदृढ़ आजीविका प्रणाली है जो जलवायु अनिश्चितताओं, अकाल, सूखा और पानी और चारागाह की कम उपलब्धता जैसी समस्याओं से निपटने के लिए बदलाव करने की क्षमता रखती है। इसीलिए समाजशास्त्रियों का मानना है कि अगर सरकारी नीतियों का सहयोग मिले तो पशुपालन दुनिया की एक बड़ी आबादी को आजीविका संवर्धन में बहुत सहयोग दे सकती है।

पशुपालन को सबसे पुराना या पहला पेशा जाता है, जिसमें आजीविका के लिए गतिशील रहना अनिवार्य है। क्या यह आधुनिक समय में उपयुक्त है?

पशुपालन के सिद्धांत पारंपरिक खेती से भिन्न हैं। इसमें फसलों के उप-उत्पादों का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें कोई ईंधन या उर्वरक उपयोग में नहीं लाया जाता। वास्तव में यह प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा देता है और दूरदराज के क्षेत्रों में भोजन का उत्पादन संभव बनाता है। भारत में पशुपालक परिवारों की सही संख्या को लेकर तस्वीर साफ नहीं है फिर भी माना जाता है कि वह देश की आबादी की एक फीसदी से ज्यादा नहीं हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के लगभग 77 फीसदी मवेशियों को खुली चराई प्रणालियों में रखा गया है और वे सामुदायिक संसाधनों जैसे चारागाहों, जंगलों और सामुदायिक जल संसाधनों पर निर्भर हैं। हो सकता है कि कई छोटे किसानों और पशुपालकों के लिए मवेशी आय का प्राथमिक स्रोत न हों, पर वह इन परिवारों की आय और पोषण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। देश का 53 फीसदी दूध और 74 फीसदी मांस का उत्पादन इसी व्यवस्था के जरिए होता है। ऐसी प्रणाली के जरिए मिलने वाले दुग्ध और अन्य उत्पाद ज्यादा स्वादिष्ट और पोषक होते हैं। खुली चराई जैसी विस्तृत प्रणालियों में रखे जाने वाले पशुधन सालाना 3,35,000 करोड़ रुपए के अनुमानित मूल्य के जैविक उर्वरक का योगदान भी करते हैं। उपरोक्त योगदान को देखते हुए कहा जा सकता है कि इनकी उपयोगिता आज के समय में भी महत्वपूर्ण है।

राजस्थान पर वापस लौटें तो आपने पशुपालन पर काफी फोकस किया है। आपके अनुभव कैसे रहे?

जहां तक हमारे अनुभवों की बात है तो हम राजस्थान में उन इलाकों में काम करते हैं जहां ज्यादातर भूमिहीन, छोटे किसान और पशुपालक सामुदायिक संसाधनों पर निर्भर हैं। शामलात संसाधनों के काम से मवेशियों और उन्हें पालने वालों को काफी मदद मिली है। हमारी कोशिश रहती है कि शामलात संसाधनों जैसे चारागाह व वनों पर समुदाय का अधिकार सुनिश्चित हो और इन्हें पुनर्जीवित किया जाए।

इससे पशुधन के लिए चारा और जल सुनिश्चित होता है। राजस्थान के अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में पशुधन उत्पादन प्रणाली के लिहाज से यह काम महत्वपूर्ण है। इसके परिणामस्वरूप, इन इलाकों में मवेशियों, खासकर छोटे मवेशियों जैसे भेड़ और बकरियों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। संरक्षित शामलात, गांव में उपलब्ध कुल सामूहिक जमीन का एक छोटा सा हिस्सा होने के बावजूद भी गांव के कुल चारे में करीब 60 प्रतिशत का योगदान देते हैं। राजस्थान में जिन गावों में शामलात संरक्षित हैं, वहां औसतन एक परिवार को हर साल लगभग 10 हजार रुपए का चारा शामलात से मिल रहा है।

आप यह काम राजस्थान में ही क्यों कर रहे हैं? क्या इस राज्य का परिदृश्य पशुपालन के लिए बेहतर है?

राजस्थान में प्राकृतिक संसाधनों के विकास से जुड़ा कोई भी काम शुष्क-खेती व्यवस्था के दायरे में ही किया जा सकता है। मवेशी राजस्थान में आजीविका के बड़े स्रोत हैं। यहां नियमित और कभी-कभी गंभीर सूखे के चलते भूमिहीन, सामाजिक रूप से पिछड़ा वर्ग और छोटे किसान आजीविका के लिए एक से ज्यादा स्रोतों पर निर्भर हैं। राज्य में एकमात्र आजीविका विकल्प के रूप में केवल खेती करना व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि इसका अधिकांश भूभाग वर्षा पर निर्भर है। इसलिए राजस्थान का शुष्क और अर्ध-शुष्क वातावरण, पशुधन आधारित खेती को आजीविका के लिए ज्यादा विश्वसनीय विकल्प बनाता है। ये काम हम सिर्फ राजस्थान ही नहीं, बल्कि देश के अन्य शुष्क और अर्ध-शुष्क राज्यों जैसे गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में भी कर रहे हैं।

चारागाह भूमि पशुपालन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, खासकर भूमिहीन, सीमांत और छोटे किसानों के लिए, लेकिन राज्य में इस भूमि का एक बड़ा हिस्सा खराब हो चुका है। स्वस्थ और संरक्षित सामुदायिक भूमि से चारा और पानी उपलब्ध हो सकता है जिससे पशुधन को प्रत्यक्ष मदद मिलती है और पशुपालकों की आजीविका मजबूत होती है। इससे पशुपालकों को सूखे और बीमारियों जैसी प्राकृतिक आपदाओं से लड़ने में मदद मिलती है। आदर्श स्थिति तो यह होगी कि राज्य सरकार समुदायों को शामलात संसाधनों जैसे चारागाह व वनों के प्रबंधन और शासन का अधिकार देना लगातार जारी रखें ताकि इन संसाधनों की हालत में सुधार हो सके।

जब हम पशुपालन की बात करते हैं तो चारागाह की उपलब्धता और चारे की उपलब्धता, ये दो बड़े सवाल सामने आते हैं। आप उनका प्रबंधन कैसे करते हैं?

हमारा निरंतर प्रयास है कि सामुदायिक जमीन पर स्थानीय समुदाय का हक सुरक्षित हो, साझा प्राकृतिक-संसाधनों के स्थानीय प्रबंधन में सुधार हो, इन कामों के लिए स्थानीय संघों को बढ़ावा मिले और जंगलों, चारागाहों और जल संसाधनों को बेहतर करने के लिए मनरेगा जैसे सार्वजनिक कार्यक्रम का उपयोग होता रहे। इसके अलावा हम खेती और पशुपालन को मजबूत करने के लिए जंगल या चारागाह जैसे सामुदायिक संसाधन के संतुलित इस्तेमाल पर जोर देते हैं ताकि स्थानीय समुदायों को पर्याप्त भोजन, जानवरों को चारा, पानी और जलाने की लकड़ियां मिलती रहें। प्रकृति-कार्यशाला (एफईएस की क्षमतावर्द्धन इकाई) के माध्यम से हम ग्रामीण समुदायों, दुग्ध संघों, पंचायतों और सरकारी विभागों की क्षमतावर्द्धन के लिए काम करते हैं, जिससे राजस्थान में साझा प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर तरीके से संरक्षण किया जा सके।

हाल में राजस्थान सरकार ने मनरेगा के अंतर्गत चारागाहों और पानी के स्रोतों के विकास को प्राथमिकता दी है। एफईएस ने ग्रामीण विकास विभाग के साथ जागरुकता बढ़ाने के लिए अभियान चलाने, मनरेगा को सक्रिय करने और भूमि और जल संसाधनों को बहाल करने के लिए सरकार के साथ मिलकर काम किया है। साथ ही, पंचायत और ब्लॉक अधिकारियों की क्षमतावर्द्धन के लिए बंजर भूमि और चारागाह विकास विभाग के साथ कार्य आरम्भ किया है। जिन गांवों में हम काम कर रहे हैं, वहां सामुदायिक जमीनों, खासकर चारागाहों को पुनःस्थापित कराने जैसे सामुदायिक प्रयासों से चारे और पानी की उपलब्धता बढ़ी है। जाहिर है, इससे पशुपालन भी मजबूत हुआ है। इसलिए आवश्यक है कि हम सामुदायिक भूमि और पशुपालन आधारित आजीविका को सुदृढ़ बनाने के लिए प्रयास करते रहें। इसी से गांव का आजीविका तंत्र मजबूत होगा।

https://www.downtoearth.org.in/hindistory/economy/rural-economy/Community-resources-meet-60-percent-of-fodder-needs-83561


Tuesday, 19 July 2022

आवरण कथा: जहां चाह, वहां राह

राजस्थान के कई गांव चारागाह का विकास और प्रबंधन करके चारे के संकट से उबर चुके हैं

By Bhagirath Srivas

On: Tuesday 19 July 2022
उदयपुर के तिरोल गांव में विकसित किए गए चारागाह से ग्रामीणों की साल भर की चारे की जरूरतें पूरी हो रही हैं। ग्रामीणों को अब चारा नहीं खरीदना पड़ता (फोटो: विकास चौधरी)

चारे की जद्दोजहद के पहली कड़ी और दूसरी कड़ी के बाद पढ़ें अगली कड़ी - 

शुष्क और अर्द्धशुष्क राजस्थान भले ही चारे के संकट से जूझ रहा हो लेकिन राज्य के बहुत से गांव इससे पूरी तरह उबर चुके हैं। उदयपुर जिले का बूझ गांव ऐसे ही गांवों की सूची में शामिल है। यहां रहने वाली मोहनी बाई का परिवार गांव के उन 180 परिवारों में है, जिन्हें अब चारा नहीं खरीदना पड़ता। करीब 800 लोगों की आबादी और लगभग 2,000 मवेशियों (300 बैल, 1,200 बकरी, 500 गाय व भैंस) वाले इस गांव में पिछले तीन साल में यह परिवर्तन हुआ है। गांव में रहने वाली 50 वर्षीय सरसी बाई 2016 से पहले के दिनों को याद करती हैं, “हमने चारे के लिए बड़ा संघर्ष किया है। हमें 6-7 किलोमीटर दूर निजी बीड (निजी पहाड़ अथवा चारागाह) से चारा खरीदकर लाना पड़ता था।” सरसी बाई कहती हैं कि किसानों को खेतों से कुछ हद तक चारा मिल जाता है लेकिन इसकी उपलब्धता सीमित दिनों के लिए ही होती है। ऐसे में चारा खरीदना अधिकांश परिवारों की मजबूरी और जरूरत दोनों थी।

वर्तमान में रावलिया कला-2 ग्राम पंचायत के बूझ गांव में चारागाह से अब हर साल औसतन 90-100 बंडल (200-250 किलो) चारा प्रत्येक परिवार को मिल रहा है। बाजार में 2-3 किलो के चारे की एक पुले (बंडल) की औसत कीमत 8-10 रुपए है। प्रति परिवार करीब 1,000 रुपए और पूरे गांव के करीब 1 लाख 80 हजार रुपए सिर्फ सूखे चारे पर बच रहे हैं। इसके अलावा खुली चराई के लिए उपलब्ध चारागाह से गांव की हरे चारे की जरूरतें पूरी हो जाती हैं। सूखे और हरे चारे को मिलाकर देखें हर परिवार को साल में औसतन 10,000 रुपए के मूल्य के बराबर का चारा लगभग निशुल्क प्राप्त हो रहा है।

गांव में चारे की आत्मनिर्भरता के बीज छह साल पहले पड़े थे। यह वह वक्त था जब ग्रामीण एक सर्वेक्षण के दौरान शामलात (सामुदायिक भूमि) के प्रबंधन और उसके पुनरोद्धार पर काम करने वाली गैर लाभकारी संस्था फाउंडेशन फॉर इकोलोजिकल सिक्युरिटी (एफईएस) के संपर्क में आए। एफईएस राजस्थान सहित देशभर के कई राज्यों में शामलात को विकसित करने की दिशा में पिछले कई दशकों से काम कर रही है। चारागाह का प्रबंधन और विकास उसकी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है।

एफईएस के सहयोग से ग्रामीणों ने सबसे पहले भूजेश्वर चारागाह विकास एवं प्रबंधन समिति गठित की और चरणबद्ध तरीके से चारागाह का प्रबंधन शुरू किया। समिति के सदस्य दीपक श्रीमाली चारागाह विकास की कहानी समझाते हैं, “हमारी चारे की समस्या जानने के बाद संस्था के लोगों ने बताया कि गांव के चारागाह को दुरुस्त कर दिया जाए तो यह परेशानी दूर हो सकती है। चारागाह का विकास लोगों के विकास से जुड़ा था, इसलिए गांव के लोगों को तत्काल उनकी बातें समझ में आ गईं।” दीपक श्रीमाली कहते हैं कि हमने गांव के 17 हेक्टेयर का चारागाह विकसित करने के लिए सबसे पहले समिति बनाकर उसकी चारदीवारी करवाई। इस जमीन पर खुली चराई पर पूरी तरह रोक लगा दी गई ताकि चारागाह फिर से विकसित और हरा भरा हो सके।

पशुओं की खुली चराई के लिए 20 हेक्टेयर चारागाह को खुला रखा गया ताकि पशुपालकों को परेशानी न हो। विकसित किए जा रहे चारागाह पर स्थानीय प्रजातियों के 2,500 पौधे लगाए और पानी व नमी को बरकरार रखने के लिए छोटे-छोटे चेकडैम बनाए गए। दो साल के भीतर चारागाह में चार से पांच फीट घास खड़ी हो गई। लेकिन लोगों ने चारा काटने में जल्दबाजी नहीं की। उन्होंने चारागाह को और विकसित होने दिया। 2019 में यह इतना विकसित हो गया कि समिति ने लोगों को घास काटने की इजाजत दे दी। समिति ने “हर घर एक दातडी” की व्यवस्था की। इस व्यवस्था के तहत हर घर से केवल एक व्यक्ति को चारा काटने की अनुमति दी गई। समिति ने चारागाह के प्रबंधन के लिए सख्त नियम बनाए हैं। मसलन, अगर कोई व्यक्ति अपने पशुओं को चारागाह में घुसाता है तो उसे 1,000 रुपए का जुर्माना देना होगा। पेड़ से लकड़ियां काटने पर 500 रुपए का जुर्माना है।

दीपक श्रीमाली इस बात से खुश हैं कि समिति के नियमों का सभी ग्रामीण सम्मान करते हैं और अब तक किसी पर जुर्माना लगाने की नौबत नहीं आई है। समिति आमतौर पर नवंबर-दिसंबर में चारा काटने की अनुमति देती है। इसकी ऐवज में समिति प्रत्येक परिवार से 20 रुपए का शुल्क वसूलती है। यह धनराशि समिति के बैंक खाते में जमा होती है और इससे चारागाह के रखरखाव का काम किया जाता है। बूझ गांव के 17 हेक्टेयर के चारागाह से बेहतर नतीजे मिलने पर समिति ने गांव में 15 हेक्टेयर का एक अन्य चारागाह 2019 में विकसित करना शुरू कर दिया। अब यह चारागाह भी ग्रामीणों के लिए चारे का सुलभ स्रोत बन गया है। इन दो चारागाहों की मदद से कुछ ग्रामीण इस स्थिति में पहुंच गए हैं कि वे अतिरिक्त चारा बेचने लगे हैं। सरसी बाई और उन जैसी तमाम महिलाएं जो चारे के लिए 6-7 किलोमीटर दूर जाती थीं, अब उनके लिए घर से 500 मीटर की दूरी पर ही चारा उपलब्ध है। सरसी बाई बताती हैं कि मार्च के मध्य में भी यहां इतना चारा बचा है कि हमें बाजार पर निर्भर होने की जरूरत नहीं है।

उदयपुर के बूझ गांव की तर्ज पर जिले के कई अन्य गांवों में भी इस तरह की पहल हुई है। उदाहरण के लिए 1,000 लोगों की आबादी वाले उदयपुर के ही तिरोल गांव में 52 हेक्टेयर के चारागाह को संरक्षित और विकसित किया जा चुका है। 2017 में शुरू हुए इस संरक्षण कार्य की बदौलत गांव के लगभग 350 परिवार चारे की कमी से उबर चुके हैं। बूझ गांव की तरह यहां भी चारागाह के विकास और प्रबंधन के लिए चारागाह विकास एवं भू प्रबंधन समिति का गठन किया गया है। याद्दाश्त के धनी समिति के 81 वर्षीय अध्यक्ष मेघ सिंह के अनुसार, 2017 से पहले चारागाह भूमि पर ग्राम पंचायत का नियंत्रण था, लेकिन समिति के गठन के बाद और ग्राम पंचायत के अनापत्ति पत्र जारी करने के बाद इसके प्रबंधन का जिम्मा समिति के हाथों में आ गया।

मेघ सिंह के अनुसार, चारागाह से पर्याप्त मात्रा में चारा मिलने से जहां ग्रामीणों का चारे पर खर्च बचा है, वहीं चारे की तलाश में बर्बाद होने वाले समय की भी बचत हुई। तिरोल में बहुत से ग्रामीण ऐसे हैं जिन्होंने इतना चारा इकट्ठा कर लिया है कि उनके पशुओं को आने वाले कुछ महीनों खासकर अप्रैल-जून तक चारे की परेशानी नहीं होगी। डाउन टू अर्थ जब मार्च के दूसरे हफ्ते में इस गांव में पहुंचा, तब कई घरों के सामने सूखे चारे के ढेर देखे, जो चारागाह की देन हैं। यहां मिले 50 वर्षीय ग्रामीण केसर सिंह ने अपनी छह भैसों के लिए पर्याप्त चारे का इंतजाम कर लिया है। इसी तरह 42 वर्षीय सोनकी बाई चारागाह से पिछले 4-5 वर्षों से चारा हासिल कर रही हैं।

उनका कहना है कि बरसात से पहले केवल एक महीने के लिए ही उन्हें चारा खरीदना पड़ता है, शेष 11 महीने के चारे की जरूरत चारागाह पूरी कर देता है। मेघ सिंह चारागाह को ग्रामीणों के लिए वरदान मानते हुए बताते हैं कि इसने चारे पर खर्च लगभग खत्म कर दिया है। सूखे चारे के साथ-साथ चारागाह पर साल भर गांव के मवेशी, खासकर छोटे मवेशी खुली चराई भी करते हैं। एफईएस के कार्यकारी निदेशक संजय जोशी के अनुसार, सूखे और हरे चारे को मिलाकर हर परिवार को साल भर औसतन 10,000 रुपए के मूल्य के बराबर का चारा लगभग मुफ्त मिल रहा है।

आसान नहीं रहा पुनर्जीवन

बूझ और तिरोल जैसे कई गांवों को समझ में आ चुका है कि पशुधन की उत्पादकता और आजीविका को मजबूत बनाने में चारागाह की महती भूमिका है और इसीलिए चारागाह का विकास पूरे राजस्थान में धीरे-धीरे जोर पकड़ रहा है। उदाहरण के लिए भीलवाड़ा जिले के स्वरूपपुरा गांव के ग्रामीणों ने फतेहपुरा और नांगली गांव में चारागाह के विकास से प्रभावित होकर 2017 में समिति का गठन कर 142 हेक्टेयर के चारागाह को विकसित करने की योजना पर काम शुरू किया। हालांकि चारागाह के विकास के काम में उन्हें कई अड़चनों का सामना करना पड़ा। गुर्जर बहुल इस गांव में चारागाह समिति के अध्यक्ष शंकर लाल गुर्जर बताते हैं, “2017 तक चारागाह खुला था। हमें इसकी सीमा का ज्ञान नहीं था।

आसपास के गांवों के पशु यहां चरने आते थे।” समिति ने 2021 में चारदीवारी का काम शुरू किया तो पड़ोसी मोचड़ियों का खेड़ा गांव के लोगों ने विरोध जताते हुए दीवार ढहा दी और अपने पशुओं को चारागाह में प्रवेश करा दिया। मोचड़ियों के खेड़ा के ग्रामीणों ने चारागाह की भूमि पर अपना हक जताते हुए मांडलगढ़ थाने में स्वरूपपुरा के ग्रामीणों के खिलाफ रिपोर्ट लिखवा दी। विवाद बढ़ने पर स्वरूपपुरा के ग्रामीणों ने चारागाह की प्रति निकलवाई और अगस्त 2021 को मांडलगढ़ उपखंड अधिकारी को पेश कर आग्रह किया कि पड़ोसी गांव के लोगों को पाबंद किया जाए जिससे दो गांव के बीच अशांति की स्थिति न बने। शंकर लाल गुर्जर के अनुसार, “तहसील में साबित हो गया कि चारागाह पर स्वरूपपुरा के ग्रामीणों का हक है।” इसके बाद मोचड़ियों के खेड़ा के लोगों को लिखित में देना पड़ा कि वे चारागाह पर हक नहीं जताएंगे।

ग्रामीण अब संघर्ष से हासिल हुए इस 142 हेक्टेयर के चारागाह को विकसित करने की प्रक्रिया में हैं। उनका कहना है कि 2022 में लगभग सभी घरों ने बाजार से चारा खरीदा है। पिछले साल भी पूरे गांव के लोगों ने करीब 3-4 लाख रुपए चारे पर खर्च किए थे। ग्रामीणों को भरोसा है कि अगले दो से तीन साल में चारागाह के विकसित होने पर चारे की समस्या का समाधान मिल जाएगा।

एफईएस के कार्यकारी निदेशक संजय जोशी राजस्थान में शामलात भूमि के प्रबंधन की दिशा में चल रहे प्रयासों पर रोशनी डालते हुए बताते हैं कि राज्य में 7,400 गांवों के अधीन 21 लाख एकड़ शामलात भूमि को विकसित किया जा रहा है। यह भूमि राज्य के 18 जिलों में लगभग 8,085 लाख लोगों को प्रभावित करती है। संजय कहते हैं, “राजस्थान में हम सरकार के साथ मिलकर शामलात भूमि के विकास और प्रबंधन की प्रक्रिया को सुदृढ़ करने का प्रयास कर रहे हैं। इस कार्य को मनरेगा में प्राथमिकता दिलाने, ग्राम स्तर पर योजना बनाने और सुचारू क्रियान्वयन के लिए प्रशिक्षण देने में हम अपनी भूमिका देखते हैं। ऐसी कोशिशें देशभर के 41,800 गांवों में भी हो रही हैं। इन गांवों में 125 लाख एकड़ सामुदायिक भूमि का प्रबंधन किया जा रहा है (देखें, सामुदायिक संसाधनों से चारे की 60 प्रतिशत जरूरतें होती हैं पूरी,)।”

लाभ का दायरा

शामलात भूमि प्रबंधन से कई पर्यावरणीय और आर्थिक लाभ हैं। एफईएस द्वारा 2016-17 में प्रकाशित “ईकॉलोजिकल हेल्थ मॉनिटरिंग” रिपोर्ट में दक्षिणी राजस्थान के भीलवाड़ा, उदयपुर और प्रतापगढ़ जिले में समुदाय द्वारा प्रबंधित और गैर प्रबंधित शामलात भूमि का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, समुदाय द्वारा प्रबंधित शामलात भूमि पर स्टैंडिंग बायोमास 13.2 टन प्रति हेक्टेयर, कार्बन स्टॉक 5.9 टन प्रति हेक्टेयर, फॉडर बायोमास 1.6 टन प्रति हेक्टेयर और जलावन लकड़ी का बायोमास 2.4 टन प्रति हेक्टेयर था। वहीं दूसरी तरफ गैर प्रबंधित शामलात भूमि पर स्टैंडिंग बायोमास केवल 5.3, कार्बन स्टॉक 2.4, फॉडर बायोमास 0.9 और जलावन लकड़ी का बायोमास 0.9 टन प्रति हेक्टेयर था। रिपोर्ट के अनुसार, समुदाय द्वारा प्रबंधित शामलात भूमि पर स्टैंडिंग बायोमास का मूल्य 39,600 रुपए प्रति हेक्टेयर और कार्बन स्टॉक का मूल्य 1,616 रुपए प्रति हेक्टेयर आंका गया, जबकि गैर प्रबंधित भूमि पर यह क्रमश: 15,900 रुपए और 649 रुपए ही था।

रिपोर्ट के अनुसार, समुदाय द्वारा संचालित और नियंत्रित भूमि से फॉडर बायोमास से प्रत्येक परिवार को 12,177 रुपए का फायदा पहुंचा। साथ ही, जलावन लड़की से 17,836 रुपए के मूल्य के बराबर हर परिवार को लाभ मिला। यह लाभ अनियंत्रित शामलात भूमि से मिलने वाले लाभ से दोगुने से भी अधिक है। चारागाह विकास के अन्य कई फायदे भी हैं जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं, जैसे पानी की उपलब्धता में सुधार, भूजल में बढ़ोतरी, स्थानीय वनस्पतियों और जीवों के लिए सुरक्षित आवास और खाने की उपलब्धता और पारिस्थितिक सेवाओं जैसे परागण और कीट नियंत्रण में बढ़ोतरी। इतना ही नहीं, शामलात प्रबंधन और विकास के लिए जब गांव में सामूहिक पहल बढ़ती है तो ग्राम स्तर पर निर्णय प्रक्रिया में गरीब और पिछड़े वर्गों के लोग, खासकर महिलाओं की भागीदारी में भी सुधार होता है।

कम होते चारागाह

चारागाह सहित शामलात भूमि का प्रबंध राजस्थान के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि पशुधन किसानों की आय का सबसे भरोसेमंद स्रोत है। 20वीं पशुधन जनगणना की मानें तो राजस्थान में देश के 11.4 प्रतिशत यानी 56.8 मिलियन मवेशी हैं जो इसे दूध उत्पादन के मामले में उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा अग्रणी राज्य बनाते हैं। लेकिन राज्य में चारे के अहम स्रोत चारागाह में लगातार कमी हो रही है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आंकड़े कहते हैं कि राजस्थान में 2014-15 से 2016-17 में बीच 4,000 हेक्टेयर चारागाह की कमी आई है। 2014-15 में यह भूमि 16,74,000 हेक्टेयर से कम होकर 2016-17 में 16,70,000 हेक्टेयर रह गई है।

राजस्थान सरकार की कृषि सांख्यिकी के अनुसार, राज्य में सर्वाधिक 19,12,000 हेक्टेयर चारागाह व अन्य चराई भूमि 1990-91 में थी। अगर इस आंकड़े की तुलना 2016-17 के आंकड़ों से करें तो पता चलता है कि राज्य में 2,42,000 हेक्टेयर चारागाह कम हुए हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो अकेले राजस्थान में 25 वर्षों में दिल्ली के कुल क्षेत्रफल (1,47,488 हेक्टेयर) से करीब डेढ़ गुना चारागाह कम हुआ है। आईजीएफआरआई द्वारा मार्च 2021 में जारी रिपोर्ट “फॉडर रिसॉर्सेस डेवलमेंट प्लान फॉर राजस्थान” की मानें तो राज्य की पशुधन उत्पादकता मुख्य रूप से हरे और सूखे चारे पर निर्भर है। लेकिन यहां 27.16 प्रतिशत हरे और 36 प्रतिशत सूखे चारे की कमी है।

फॉडर एंड पाश्चर मैनेजमेंट पर सितंबर 2011 में जारी योजना आयोग की उपसमूह 3 की रिपोर्ट में पाया गया है कि भारत की अधिकांश चारागाह भूमि जमीन पर चिन्हित नहीं की गई है। इस वजह से इसका आकलन पूर्णत: अनुमानों पर आधारित है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में करीब 12.15 मिलियन हेक्टेयर भूमि चारागाह के रूप में वर्गीकृत है। इनमें से भी करीब 40 प्रतिशत भूमि पर ही चराई हो रही है। स्पष्ट सीमांकन के अभाव में ये भूमि अन्य कार्यों के लिए स्थानांतरित की जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार, 1947 में 70 मिलियन हेक्टेयर में चारागाह थे। 1997 तक करीब आधे चारागाह खत्म हो गए और 38 मिलियन हेक्टेयर ही शेष बचे (देखें, घटते चारागाह, बढ़ती दिक्कत,)। ये चारागाह भी या तो काफी खराब हालत में है।

इन चारागाहों को वेस्टलैंड मान लिया गया है। ये भूमि आसानी से अन्य कार्यों के लिए हस्तांतरित कर दी जाती है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अधिकांश चराई भूमि लैंटाना, यूपाटोरियम, परथेनियम, प्रोसोपिस जूलिफ्लोरा जैसी विदेशी आक्रामक प्रजातियों से भर गई हैं। चारागाह के टिकाऊ प्रबंधन सुनिश्चित करने वाले ग्रामीण स्तरीय परंपरागत संस्थानों का पतन हो चुका है। यही वजह है कि नीलगिरी के शोला चारागाह, बीकानेर-जोधपुर-जैसलमेर के सीवान चारागाह, आंध्र प्रदेश के रोलापाडू चारागाह, गुजरात के बन्नी चारागाह के साथ सिक्किम और पश्चिमी हिमालय क्षेत्र के अल्पाइन चारागाह ठीक न होने वाली अवस्था में पहुंच चुके हैं।

2016-17 की कृषि से संबंधित संसदीय समिति की 34वीं रिपोर्ट में भी माना गया है कि अधिकांश चारागाह या तो बिगड़ चुके हैं अथवा अतिक्रमण का शिकार हैं जिससे पशुओं के लिए चराई भूमि कम हो रही है। समिति के अनुसार, भारत में पशुधन की आबादी बढ़ रही है लेकिन कृषिगत और गैर कृषिगत उपयोग हेतु भूमि पर दबाव बढ़ने से चारागाह धीरे-धीरे कम हो रहे हैं।

चारागाह की उपेक्षा और बदहाली ने सबसे अधिक चरवाहा और घुमंतू पशुपालक समुदाय को प्रभावित किया है। राजस्थान में इस समुदाय के लिए प्रतिबद्ध गैर लाभकारी संगठन उर्मूल ट्रस्ट में समन्वयक सूरज सिंह मानते हैं कि चारे और पानी के स्रोत सिमटने से ऊंटों से राइका समुदाय का मोहभंग होता जा रहा है। वह बताते हैं कि राइका अमूमन किसानों के खेतों में अपने पशुओं की चरने के लिए छोड़ देते हैं, लेकिन बहुत से किसानों ने अपने खेतों की मेड़बंदी करा ली है जिससे पशु खेतों में प्रवेश नहीं कर पाते। सूरज के अनुसार, “राजस्थान सरकार ने चारागाह की बहुत सी जमीन को वेस्टलैंड बताकर बड़े-बड़े सौर ऊर्जा संयंत्रों को हस्तांतरित कर दी हैं।” इस समस्याओं से आजिज आकर राइका समुदाय अपने बेड़े में ऊंटों की संख्या कम रहे हैं, नतीजतन राजकीय पशु- ऊंटों की आबादी सीमित हो रही है। पिछले कुछ वर्षों में राजस्थान में ऊंटों की आबादी में 37 प्रतिशत की गिरावट गई है। सूरज सिंह स्पष्ट कहते हैं कि राइका जैसे समुदाय के लिए ऊंटों को एक जगह रखकर खिलाना संभव नहीं है, ऐसे में चारागाह परंपरागत रूप से उनके चारे के स्रोत रहे हैं। वह घुमंतू समुदाय द्वारा पशु त्यागने की बड़ी वजह चारागाह की बदहाली को मानते हैं।

खाद्य एवं कृषि संगठन द्वारा हाल ही में जारी “मेकिंग वे: डेवलपिंग नेशनल लीगल एंड पॉलिसी फ्रेमवर्क फॉर पेस्टोरल मोबिलिटी” के मुताबिक, घुमंतू समुदाय को नीतिगत सहयोग नहीं प्राप्त हो रहा है। नीतियों में उन्हें अनुत्पादक, अप्रासंगिक और पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचाना वाला मान लिया गया है।” भारत के पशुपालन पर अहमदाबाद स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईएम), जर्मनी स्थित लीग फॉर पेस्टोरल पीपल्स द्वारा संयुक्त रूप से प्रकाशित एक अन्य रिपोर्ट “पेस्टोरलिजम इन इंडिया : ए स्कोपिंग स्टडी” में भी कहा गया है कि घुमंतू समुदाय के विकास के लिए कोई आधिकारिक नीति नहीं है। यहां तक कि कृषि और पर्यावरण एवं वन मंत्रालय का रवैया भी इनके खिलाफ है। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय तो घुमंतू समुदाय को उनके पारंपरिक चराई भूमि से बेदखल करने की मंशा रखता है।”

https://www.downtoearth.org.in/hindistory/economy/rural-economy/cover-story-where-there-is-a-will-there-is-a-way-83559

Monday, 18 July 2022

आवरण कथा: पशु चारे की जद्दोजहद, भाग-दो

पहले से ही चल रही भूसे की समस्या को बेमौसम बारिश, अत्यधिक गर्मी और गेहूं के कम उत्पादन ने बढ़ा दिया है

By Bhagirath Srivas, Arvind Shukla, Sandeep Meel

On: Monday 18 July 2022
मौसम की मार से गेहूं की फसल प्रभावित हुई। इसके कारण चारे की उपलब्धता पर असर पड़ा है (फोटो: विकास चौधरी)


भूसे की कमी के तात्कालिक और दीर्घकालिक कारण हैं। यह सरकार की नीतिगत असफलताओं का भी नतीजा है। पहला भाग पढ़ने के लिए क्लिक करें 

विडंबना यह है कि यह संकट कितना बड़ा है, इसकी गणना भी संभव नहीं है। वाराणसी स्थित उदय प्रताप कॉलेज में सस्य विज्ञान में असिस्टेंट प्रोफेसर देव नारायण सिंह आंकड़ों के अभाव को इसका कारण मानते हुए कहते हैं कि चारा उपभोग और उत्पादन के जो आंकड़े प्रयोग हो रहे हैं वे बेहद पुराने हैं और अनुमानों पर आधारित हैं। इन आंकड़ों से संकट की सच्ची तस्वीर सामने नहीं आती। मौजूदा स्थिति को देखते हुए उन्हें लगता है कि 20-25 प्रतिशत भूसे की कमी है (देखें, सरकारी नीतियों में हाशिए पर रहा चारा उत्पादन,)।

ग्रास एंड फॉरेज साइंस में जनवरी 2022 में प्रकाशित देव नारायण सिंह का अध्ययन “ए रिव्यू ऑफ इंडियाज फॉडर प्रॉडक्शन स्टेटस एंड अपॉर्च्युनिटीज” कहता है कि पंजाब और हरियाणा में जहां 8 प्रतिशत जुताई योग्य भूमि पर चारा उगाया जाता है, वहां चारे की कमी ज्यादा नहीं है, लेकिन सूखागस्त बुंदेलखंड में यह कमी गंभीर है क्योंकि यहां केवल 2 प्रतिशत जुताई योग्य भूमि पर चारा उगाया जाता है। इंडियन जर्नल ऑफ एनिमल साइंसेस में सितंबर 2021 में प्रकाशित नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एग्रीकल्चर इकॉनोमिक्स एंड पॉलिसी रिसर्च के खेमचंद का अध्ययन बताता है कि बुंदेलखंड क्षेत्र गर्मियों में 62.79 प्रतिशत चारे की कमी से जूझता है।

क्यों गहराया संकट

उत्तर प्रदेश के झांसी स्थित भारतीय चारागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान (आईजीएफआरआई) में क्रॉप प्रॉडक्शन डिविजन के प्रमुख सुनील तिवारी मशीनीकरण के उपयोग, फसलों के विविधिकरण और हीट स्ट्रेस (अत्यधिक गर्मी) को मौजूदा चारे की कमी के तीन प्रमुख कारण मानते हैं। उनका कहना है कि कंबाइन हार्वेस्टर से कटाई से भूसा कम निकल रहा है। असल में कंबाइन हार्वेस्टर मशीन फसलों के दाने वाले हिस्से की ही कटाई करती है और पुआल को खेतों में ही छोड़ देती है। पंजाब और हरियाणा जैसे राज्य इस अवशेष में आग लगा देते हैं। इससे बहुत सा सूखा चारा बर्बाद हो जाता है। तिवारी का कहना है कि मशीनीकरण से पहले खेत में अनाज के बराबर भूसा निकलता था लेकिन अब यह घटकर करीब आधा रह गया है।

वह आगे बताते हैं, “किसान गेहूं से सरसों की तरफ आकर्षित हुए हैं क्योंकि उसका भाव गेहूं से अधिक है। इसके अलावा मार्च में हीट स्ट्रेस के चलते भी गेहूं के साथ भूसे के उत्पादन में कमी आई है।” हाइब्रिड बीजों के चलन को भी भूसा संकट से जोड़ा जा सकता है। अधिक उपज देने वाले इन बीजों के पौधे ज्यादा नहीं बढ़ते। पौधे की कम लंबाई का सीधा मतलब है कम भूसा। इसके अलावा प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्य पंजाब-हरियाणा में साल की शुरुआत में हुई बारिश ने गेहूं की फसल को बुरी तरह प्रभावित किया। इन दो राज्यों से बड़े पैमाने पर भूसे का निर्यात दिल्ली, राजस्थान, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में किया जाता है और यहां चारा व्यापारियों की अच्छी खासी संख्या है। पंजाब के पटियाला निवासी ऐसे ही एक भूसा व्यापारी जॉनी सैणी मानते हैं कि साल की शुरुआत में हुई बारिश से गेहूं की आधी फसल सड़ गई। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में कृषि वैज्ञानिक बलजिंदर कौर सिदाना भी मानती हैं कि पंजाब में गर्मी और बारिश के चलते गेहूं के उत्पादन में 30 प्रतिशत की कमी आई है। पंजाब के कृषि विभाग द्वारा किए गए शुरुआती फसल कटाई प्रयोग (सीसीई) में भी माना गया है कि इस साल मार्च में बढ़ी गर्मी ने गेहूं की उपज को बुरी तरह प्रभावित किया।

मई 2022 में डायरेक्टोरेट ऑफ इकोनोमिक्स एंड स्टेटिस्टिक्स द्वारा जारी तीसरे अग्रिम अनुमान के आंकड़े भी पंजाब और हरियाणा में गेहूं की कम उपज की तस्दीक करते हैं। 31 मई 2022 तक के ये आंकड़े बताते हैं कि पंजाब में रबी सीजन 2020-21 में 171.86 लाख टन के मुकाबले 2021-22 के सीजन 144.56 लाख टन ही गेहूं की उपज संभावित हैं। इसी तरह हरियाणा में पिछले वर्ष के 123.94 लाख टन की तुलना में 106.20 लाख टन ही गेहूं उत्पादन की उम्मीद है। हरियाणा के जींद जिले के राजगढ़ धोबी गांव के कृषन के अनुसार, एक एकड़ के खेत से 10 क्विंटल ही भूसा निकला है। फसल बारिश और गर्मी से प्रभावित नहीं होती तो करीब 20 क्विंटल भूसा निकलता। संगरूर के भूसा व्यापारी नायब सिंह पंजाब में एक नए चलन की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि राज्य में दो साल पहले तक कोई सरसों की फसल नहीं लगाता था, लेकिन सरसों के भाव को देखते हुए लोगों ने सरसों की ओर रुख करना शुरू कर दिया है। वह संगरूर के महासिंहवाड़ा गांव का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि गांव में 2021 में करीब 100 एकड़ (करीब 10 प्रतिशत खेत) में सरसों की बुवाई हुई है। हालांकि बलजिंदर कौर सिदाना मानती हैं कि पंजाब में सरसों की खेती तो बढ़ी है लेकिन इससे गेहूं के कुल रकबे में विशेष अंतर नहीं पड़ा है।

7 जनवरी 2022 को जारी हुए रबी सीजन के बुवाई के आंकड़े भी गेहूं के कम रकबे और सरसों के बढ़े रकबे की पुष्टि करते हैं। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि तक पिछले वर्ष की तुलना में 5.84 लाख हेक्टेयर में गेहूं की कम बुवाई हुई है। गेहूं का कम रकबा अन्य सभी फसलों की अपेक्षा सबसे कम हुआ है। उत्तर प्रदेश में गेहूं का रकबा सबसे ज्यादा कम हुआ है। राज्य में 3.11 लाख हेक्टेयर गेहूं का रकबा घटा है। दूसरे स्थान पर हरियाणा है जहां 1.35 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गेहूं की कम बुवाई हुई है। महाराष्ट्र में 1.20 लाख हेक्टेयर, मध्य प्रदेश में 1.14 लाख हेक्टेयर और गुजरात में 0.90 लाख हेक्टेयर की कमी आई है। गेहूं की खेती के लिए लोकप्रिय पंजाब में भी इसका रकबा 0.20 लाख हेक्टेयर कम हुआ है। दूसरी तरफ सरसों का रकबा 2020-21 की तुलना में 2021-22 में सर्वाधिक 17.19 लाख हेक्टेयर बढ़ा। तिलहन फसलें कुल 98.85 लाख हेक्टेयर में बोई गई हैं। इसमें 89.71 लाख हेक्टेयर की हिस्सेदारी सरसों की है। इसका ज्यादातर रकबा उन्हीं राज्यों में बढ़ा जहां गेहूं का कम हुआ। राजस्थान अपवाद जरूर है, जहां दोनों का रकबा बढ़ा है। इन तमाम स्थितियों ने प्रत्यक्ष रूप से भूसे की उपलब्धता प्रभावित की।

मांग और आपूर्ति में असंतुलन

भारत में फसलों के अवशेष, सिंचित व असिंचित भूमि और सामुदायिक संसाधन जैसे वन, स्थायी चारागाह व चराई भूमि चारे के तीन अहम स्रोत हैं। सूखा चारा मुख्यत: फसलों के अवशेष जैसे भूसा, पुआल से प्राप्त होता है। नीति आयोग की फरवरी 2018 में जारी हुई वर्किंग ग्रुप की रिपोर्ट “डिमांड एंड सप्लाई प्रोजेक्शंस टूवार्ड्स 2033: क्रॉप, लाइवस्टॉक, फिशरीज एंड एग्रीकल्चरल इनपुट्स” की मानें तो देश में हरे चारे की 40 और सूखे चारे की 35 प्रतिशत तक की कमी है। रिपोर्ट आगे कहती है कि हरे चारे की कमी मुख्य रूप से 10 मिलियन हेक्टेयर में फैले चारागाह के बड़े हिस्से पर अतिक्रमण और चारा फसलों के सीमित क्षेत्र के कारण है। रिपोर्ट के अनुसार, चारे की कीमत दूध की तुलना में तेजी से बढ़ रही है जिससे लाभप्रदता घट रही है। इसकी कमी के चलते ही डेरी क्षेत्र की उत्पादकता कम है। इसी के चलते देश में आवारा पशुओं की समस्या विकराल होती जा रही है। 2019 में जारी हुई 20वीं पशुधन जनगणना के अनुसार, भारत में आवारा पशुओं की संख्या 50 लाख से अधिक हो चुकी है। सर्वाधिक पशुधन की आबादी वाले 10 में से 7 राज्यों में इनकी संख्या 2012 से 2019 के बीच बढ़ी है। ऐसे राज्यों में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात प्रमुखता से शामिल हैं। इनमें से अधिकांश राज्य चारे की कमी से जूझ रहे हैं।

जून 2017 में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ लाइवस्टॉक रिसर्च में प्रकाशित बंगलुरू के वेटरिनरी कॉलेज के डिपार्टमेंट आॅफ वेटरिनरी एंड एिनमल हस्बेंडरी एक्सटेंशन एजुकेशन में स्कॉलर मुत्तूराज यादव के अध्ययन के अनुसार, भारत में 355.93 मिलियन टन सूखा चारा फसलों के अवशेष से प्राप्त होता है। अध्ययन के अनुसार, राष्ट्रीय स्तर पर 574.3 मिलियन टन सूखा चारा उपलब्ध है। इसकी 62.5 प्रतिशत आपूर्ति फसलों के अवशेष से होती है। वहीं हरे चारे की आपूर्ति चारा फसलों ज्वार, बाजरा, मक्का, बरसीम आदि से होती है। देश के कुल फसली क्षेत्र में से केवल 5 प्रतिशत पर ही चारा उगाया जाता है। शेष हरे चारे की आपूर्ति चारागाह, वन व अन्य सामुदायिक भूमि से पूरी होती है।

उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के नरैनी में स्थित इस गोशाला में दिसंबर 2021 में चारे की कमी के चलते बड़े पैमाने पर गायों की मौत हो गई थी। यहां की लगभग 50 मरी और अधमरी गाय को मध्य प्रदेश के जंगल में ले जाकर दफना दिया गया था (फोटो: अशोक निगम)

अगस्त 2019 में आईजीएफआरआई के शोधकर्ता और वैज्ञानिक अजॉय कुमार रॉय, नीतिश रत्तन भारद्वाज और सनत कुमार महंता के शोधपत्र “रिविजिटिंग नेशनल फॉरेज डिमांड एंड अवेलिबिलिटी सिनेरियो” के अनुसार, चारा फसलों से 88 प्रतिशत हरे चारे की आपूर्ति होती है और शेष वनों, चारागाह, परती भूमि और जुताई योग्य बंजर भूमि से मिलता है। हरे चारे के सभी स्रोतों से 734.2 मिलियन टन की आपूर्ति होती है, जबकि आवश्यकता 827.19 मिलियन टन की है। अध्ययन के अनुसार, देश में करीब 89 मिलिटन टन (11.24 प्रतिशत) हरे चारे की कमी है। वहीं सूखे चारे की 23.4 प्रतिशत की कमी है। 426.1 मिलियन टन की मांग के मुकाबले 326.4 मिलियन टन ही सूखा चारा उपलब्ध है। हालांकि कुछ अन्य रिपोर्ट कमी की अलग तस्वीर पेश करती हैं। मसलन 2016-17 की कृषि संबंधी स्थायी समिति की 34वीं रिपोर्ट में बंगलुरु स्थित राष्ट्रीय पशु पोषण एवं शरीर क्रिया विज्ञान संस्थान (एनआईएएनपी) अनुमान के आधार पर कहा गया कि वर्ष 2020 में 23 प्रतिशत सूखे चारे, 32 प्रतिशत हरे चारे की कमी होगी। रिपोर्ट में अनुमान है कि 2025 तक हरे चारे की कमी बढ़कर 40 प्रतिशत हो जाएगी जबकि सूखे चारे की कमी 23 प्रतिशत ही रहेगी। 10वीं पंचवर्षीय योजना के दस्तावेज में अनुमान लगाया गया है कि 2025 तक हरे चारे की कमी 64.87 और सूखे चारे की कमी 24.92 प्रतिशत हो जाएगी।

20वीं पशुधन जनगणना के अनुसार, भारत में करीब 535 मिलियन पशु हैं जो विश्व में सर्वाधिक है, लेकिन इनकी दूध उत्पादकता वैश्विक औसत 2,238 किलोग्राम प्रतिवर्ष की तुलना में ही 1,538 किलो प्रतिवर्ष ही है। चारे की भारी कमी पशुओं के कुपोषण और कम दूध उत्पादन की प्रमुख वजह है। मार्च 2015 में लोकसभा में पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में कृषि मंत्रालय ने बताया कि भारत में प्रति वर्ष प्रति पशु 1,200 किलो हरा और 1,400 किलो सूखा चारा ही उपलब्ध है। जबकि सूखे चारे की वार्षिक आवश्यकता लगभग 2,200 किलो (6 किलो प्रतिदिन/पशु) और हरे चारे की वार्षिक आवश्यकता 3,600 (10 किलो प्रतिदिन/पशु) किलो है।


आईजीएफआरआई के मुताबिक, देश की कुल जोत के मुकाबले लगभग 4 प्रतिशत क्षेत्रफल में ही चारा उगाया जाता है, जबकि पशुधन की आबादी को देखते हुए इसे 12 से 16 प्रतिशत करने की आवश्यकता है। देव नारायण सिंह एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू की ओर इशारा करते हुए बताते हैं कि खाद्यान्न फसलों की तरह चारा फसलों का दस्तावेजीकरण नहीं हो रहा है। सबसे अधिक पशुधन के बाद भी चारा फसलों को कल्टीवेटेट फसल के रूप में मान्यता नहीं मिली है। वह चारे संकट को नीतिगत मानते हुए कहते हैं, “सरकार ने चारा बाजार का व्यवस्थित तंत्र विकसित करने की कभी पहल नहीं की। यही वजह है कि सरकारी सेक्टर के अधीन कोई चारा मार्केट नहीं है। पूरा बाजार असंगठित क्षेत्र के हवाले है। राज्यों ने चारे की कमी को देखते हुए कुछ कदम जरूर उठाए हैं, लेकिन कोई समस्या की जड़ में नहीं गया” अजॉय कुमार रॉय अपने अध्ययन में सुझाव देते हैं कि चारा विकास कार्यक्रम मिशन मोड में चलाने की आवश्यकता है। सालभर चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए चारा उत्पादन और उसके संरक्षण की जरूरत है। चारागाह नीति बनाने और बदहाल अवस्था में पहुंच चुके चारागाह को पुनर्जीवित करने की भी जरूरत है। साथ ही चारे फसलों की किस्मों में सुधार, तकनीकी सुधार, बीज उत्पादन की दिशा में अनुसंधान और विकास की तत्काल आवश्यकता है। 

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Saturday, 16 July 2022

आवरण कथा: पशु चारे की जद्दोजहद, भाग-एक

भूसे की महंगाई ने पशुपालन की लागत में बेतहाशा बढ़ोतरी कर दी है और इसके परिणामस्वरूप किसान व पशुपालक पशुओं को छोड़ने पर मजबूर हो रहे हैं। कितना बड़ा है यह संकट? मौसम से इसका क्या संबंध है?

By Bhagirath Srivas

On: Saturday 16 July 2022
दिल्ली के नजफगढ़ में स्थित तूड़ा मंडी में भूसे की आवक में 20-25 प्रतिशत तक की कमी आई है। भूसा व्यापारियों को हरियाणा और पंजाब में ही महंगा भूसा मिल रहा है (फोटो: सनी गौतम)


हरियाणा के गुड़गांव जिले के लोकरा गांव में रहने वाले 39 साल के मंगतराम ने 15 साल पहले ऑटोमोबाइल कंपनी की नौकरी छोड़ने के बाद जब डेरी फार्मिंग के व्यवसाय में कदम रखा, तब उन्हें इसमें ही अपना भविष्य नजर आता था। वह नौकरी की जी हुजूरी से तंग आकर अपना खुद का काम शुरू करना चाहते थे। डेरी फार्मिंग का काम उन्हें मुफीद लगा। इसमें भविष्य को और चमकदार बनाने के लिए वह पशु चिकित्सक भी बन गए। शुरुआत में उन्होंने दो भैंस से दूध का काम शुरू किया और अगले साल भैंस हटाकर वह गीर, सहीवाल, राठी, थारपारकर नस्ल की गायों को ले आए और साल दर साल उनकी संख्या बढ़ाते रहे। लेकिन अब स्थितियां बदल चुकी हैं। 2021 के अंत में उन्हें महसूस होने लगा कि पशुपालन से दूरी बनाने का वक्त आ गया है। चारे, खासकर भूसे की अचानक बढ़ी कीमत ने उन्हें डेरी फार्मिंग को समेटने पर मजबूर कर दिया।

फरवरी-मार्च 2022 तक आते-आते उन्होंने अपनी 39 दुधारू गायों को धीरे-धीरे कम करना शुरू कर दिया और अप्रैल के आखिर तक डेरी फार्म से कुल 28 गाय कम कर दीं। उनकी दुधारू गाय का बाजार भाव 80-90 हजार रुपए है लेकिन अधिकांश गाय उन्होंने किसी को 5 हजार तो किसी को 7 हजार रुपए में निकाल दी। 10 गाय तो राजस्थान के घुमंतू राइका समुदाय को मुफ्त में दे दी। मौजूदा समय में उनके पास 7 वयस्क गाय, 2 बछड़े और 2 बैल ही बचे हैं। पशुपालकों का दर्द साझा करते हुए मंगतराम कहते हैं कि भूसे के आसमान छूते भाव के बीच पशुओं को खिलाना असंभव होता जा रहा है। इस साल उन्होंने 1,500 रुपए प्रति क्विंटल के भाव पर भूसा खरीदा है। पिछले साल उन्हें यही भूसा करीब 425 रुपए प्रति क्विंटल में मिला था।

भूसे के उछाल मारते भाव के साथ लोकरा गांव में दुधारू पशुओं को बेचने का सिलसिला पिछले छह महीने के दौरान तेजी से बढ़ा है। 2021 में गांव में लगभग 450 गाय थीं। मई 2022 तक लगभग 66 प्रतिशत गाय लोगों ने बेच दी हैं। चारे की महंगाई के चलते गाय बेचने को विवश हुए 30 वर्षीय एक अन्य पशुपालक प्रवीण यादव ने हाल में अपने जीवन का सबसे महंगा भूसा खरीदा है। पशुपालन से निराश हो चुके प्रवीण ने डाउन टू अर्थ को बताया कि एक कीले (1 एकड़) का भूसा उन्होंने 30 हजार रुपए में खरीदा है। एक कीले में 20-22 क्विंटल भूसा निकलता है। एक क्विंटल भूसा उन्हें 1,350 से 1,500 रुपए के बीच पड़ा है। इस साल अप्रैल में प्रवीण ने भी मंगतराम की तरह कुल 9 गाय बेच दीं। फिलहान उनके पास 14 गाय हैं।

गाय कम करने से उनका दूध का उत्पादन लगभग आधा रह गया है। मंगतराम के अनुसार, “इस साल मुझे 39 गाय के चारे और फीड पर हर महीने 3.10 लाख रुपए खर्च करने पड़ रहे थे, जबकि 2021 में यह खर्च 1.96 लाख रुपए था। इससे मैं हर महीने लगभग 47 हजार रुपए के फायदे से करीब 67 हजार रुपए के घाटे में आ गया हूं।” दिसंबर 2021 से मार्च 2022 बीच उन्हें 2.5 से 3 लाख रुपए का नुकसान हो चुका है। हरियाणा में भूसे का यह हाल तब है जब विभिन्न अनुमानों में राज्य में मांग से अधिक सूखे चारे की उपलब्धता की बात कही जा रही थी। 13 मार्च 2015 को लोकसभा सदस्य रामदास अठावले द्वारा पूछे एक प्रश्न के जवाब में खुद कृषि राज्यमंत्री संजीव कुमार बालियान ने बताया था कि हरियाणा में 48 प्रतिशत हरे चारे की कमी है लेकिन सूखा चारा आवश्यकता से अधिक है। हालांकि ये अनुमान पुराने हैं और इनसे मौजूदा स्थिति स्पष्ट नहीं होती।

प्रतिबंधों की झड़ी

पशुधन के लिए भूसा सबसे महत्वपूर्ण भोजन है। नीति आयोग के वर्किंग ग्रुप द्वारा 2018 में प्रकाशित रिपोर्ट “डिमांड एंड सप्लाई प्रोजेक्शन टूवार्ड्स 2033: क्रॉप, लाइवस्टॉक, फिशरीज और एग्रीकल्चरण इनपुट्स” में कहा गया है कि पशुधन की 71 प्रतिशत भोजन की जरूरतें फसलों के अवशेष से पूरी होती है, जबकि 23 प्रतिशत भोजन की जरूरतें हरे चारे और 6 प्रतिशत भोजन का स्रोत सांद्रण (कंसन्ट्रेशन फीड) है। चूूंकि हरे चारे की आपूर्ति सीमित समय के लिए होती है और भूसा का भंडारण लंबे समय तक किया जा सकता है, इसलिए पशुपालकों के लिए भूसे का बड़ा महत्व है।

वर्तमान में हरियाणा में यह भूसा संकट इतना गहरा गया कि गोशालाओं के लिए इसे खरीदना मुश्किल हो गया। अप्रैल 2022 में राज्य के गोशाला संचालकों ने धमकी दी कि प्रशासन ने भूसा सस्ता नहीं किया तो वे गोशालाओं में ताला लगाकर पशुओं को खुला छोड़ देंगे। इस धमकी के बाद सर्वाधिक पशुधन वाले फतेहाबाद, हिसार और सिरसा जैसे जिलों ने 21-26 अप्रैल के बीच भूसे को जिले से बाहर ले जाने पर ही पाबंदी लगा दी। साथ ही ईंट भट्टों और कार्डबोर्ड की फैक्टरियों में भी चारे के इस्तेमाल पर रोक लगा दी। 21 अप्रैल के अपने एक आदेश में सिरसा के उपायुक्त अजय सिंह ने कहा कि चारा बाहर भेजने से जिले में इसका संकट खड़ा हो सकता है।

हरियाणा के गुड़गांव जिले के लोकरा गांव में रहने वाले मंगतराम ने चारे की महंगाई के चलते 28 गाय बेच दी हैं और डेरी फार्मिंग का काम बंद करने का फैसला ले लिया है (फोटो: सनी गौतम)

उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में बारिश न होने पर स्थिति और बिगड़ सकती है। ऐसे हालात में सूखाग्रस्त क्षेत्रों में अधिक चारे की आवश्यकता होगी। इस स्थिति से बचने के लिए ही प्रतिबंध लगाया गया है। फतेहाबाद में ऐसे आदेश के बाद जिले से बाहर जा रही ट्रैक्टर ट्रॉलियों को सीमा पर रोक दिया और भूसा व्यापारियों से कहा गया कि गोशालाओं को सस्ती दरों पर भूसा उपलब्ध कराएं। इसी तरह रोहतक जिला प्रशासन ने भूसे को जिले से बाहर जाने से रोकने के लिए धारा 144 लगा दी। अप्रैल में राज्य के कुछ अन्य जिलों ने भी चारा बाहर ले जाने पर रोक लगाई। एेसे प्रतिबंध केवल हरियाणा तक सीमित नहीं रहे। मध्य प्रदेश के बैतूल, अशोकनगर, रतलाम, टीकमगढ़, जबलपुर, छतरपुर, मंदसौर, सीधी, पन्ना आदि जिलों ने भूसे के निर्यात पर रोक लगाई। उत्तराखंड में पशुपालन विभाग के सचिव ने 5 मई को सभी जिलाधिकारियों को आदेश जारी कर 15 दिनों के लिए भूसे को राज्य से बाहर ले जाने पर रोक लगा दी।

सचिव ने आदेश में कहा, “हरियाणा व अन्य राज्यों द्वारा भूसे की आपूर्ति पर रोक लगाने के कारण भूसे की दरों में अत्यधिक उछाल आ गया है। भूसे की कमी और ऊंची कीमतों के चलते बड़ी संख्या में पशुओं का त्याग किया जा सकता है, जिससे कृषि उपज को हानि, सड़क हादसे तथा कानून व्यवस्था को चुनौती पैदा होने की आशंका है।”

भूसा दान की कवायद
अप्रैल में उत्तर प्रदेश के पीलीभीत, मैनपुरी और शाहजहांपुर के प्रशासन ने भी आदेश जारी कर भूसे को जिले से बाहर ले जाने पर रोक लगा दी। इसके अलावा राज्य में कुछ अन्य कदम भी उठाए गए जो संकट गहराने के संकेत देते हैं। जैसे फिरोजाबाद के उरांव ब्लॉक के खंड शिक्षा अधिकारी ने सुंकल शिक्षकों के लिए 24 मई 2022 को जारी आदेश में कहा कि वे गोवंश आश्रय स्थल उखरेंड के लिए 200 क्विंटल भूसा दान कराएं।

इसी तरह का आदेश पूर्वांचल के संत कबीर नगर जिले में बेसिक शिक्षा अधिकारी ने अपने खंड शिक्षा अधिकारी को दिया है। डाउन टू अर्थ से बात करते हुए फिरोजाबाद की जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी अंजली अग्रवाल ने कहा, “भूसा दान कराने के लिए कोई आदेश नहीं दिया गया है, सिर्फ सहयोग की अपेक्षा की गई है।” फिरोजाबाद के ही कई ब्लॉक में इससे पहले बिजली विभाग के कर्मचारियों को भी भूसा दान कराने को कहा गया, लेकिन कुछ कर्मचारियों के विरोध के बाद जिलाधिकारी सूर्यपाल गंगवार ने कहा था कि भूसा दान पूर्णरूप से स्वैच्छिक है।

अधिकारी भले ही भूसा दान को स्वैच्छिक बता रहे हों लेकिन जून के पहले सप्ताह में जारी हुए कुछ आदेश सख्ती के संकेत देते हैं। मसलन 1 जून को वाराणसी के मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी ने आदेश में कहा, “जिले की गोशालाओं के लिए शासन द्वारा 18,000 क्विंटल भूसा दान का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। लेकिन अभी तक केवल 327 क्विंटल भूसा ही दान द्वारा प्राप्त कराया गया है। इस पर मुख्य सचिव, जिलाधिकारी और मुख्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा नाराजगी जाहिर की गई है।” आदेश में जिले के सभी पशु चिकित्सा अधिकारी, पशुधन प्रसार अधिकारी और वेटरिनरी फार्मासिस्ट को निर्देश दिया गया कि दानदाताओं से संपर्क कर लक्ष्य के अनुसार भूसे की आपूर्ति 4 जून तक सुनिश्चित करें। ऐसा न होने पर उच्च अधिकारियों को अवगत करा दिया जाएगा। आदेश में प्रति पशु चिकित्सा अधिकारी 350 क्विंटल (कुल 16), प्रति पशुधन प्रसार अधिकारी (कुल 30) 300 क्विंटल और प्रति वेटरिनरी फार्मासिस्ट (कुल 15) 230 क्विंटल भूसे का लक्ष्य निर्धारित किया गया।

इसी तरह 2 जून को गाजीपुर के मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी ने चेतावनी भरे अंदाज में जिले के सभी उप मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारियों और पशु चिकित्सा अधिकारियों को निर्देशित किया कि वे 425.5 क्विंटल भूसा दान सुनिश्चित करें और प्रतिदिन की सूचना लिखित में दें। इस कार्य में कोई शिथिलता न बरती जाए। उत्तर प्रदेश पशु चिकित्सा संघ के अध्यक्ष राकेश कुमार डाउन टू अर्थ को बताते हैं कि भूसा दान के लिए किसी भी विभाग के अधिकारी-कर्मचारी को शामिल नहीं किया जाना चाहिए। न ही लक्ष्य मिलना चाहिए। वह आगे कहते हैं, “पहले भी सालभर भूसे की किल्लत रहती थी, लेकिन इस बार तो सीजन में ही महंगा है। सरकार की कोशिश है कि ज्यादा से ज्यादा भूसा दान के जरिए मिल जाए, लेकिन यह ऊंट के मुंह में जीरे जैसा है।

गोशालाओं में 9 लाख से ज्यादा पशु हैं। इनके पोषण के लिए सालभर काफी भूसा, हरा चारा चाहिए।” उत्तर प्रदेश की गोशालाओं को प्रति गोवंश प्रतिदिन 30 रुपए के हिसाब से महीने में 900 रुपए का भुगतान किया जाता है। यह राशि चारे की बढ़ी कीमत को देखते नाकाफी साबित हो रही है। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के एक ग्राम सचिव ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया, “एक वयस्क गाय महीने में लगभग 200 किलो भूसा खाती है। भूसे के मौजूदा भाव 1,200 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से देखें तो एक गाय हर महीने लगभग 2,400 रुपए का भूसा खा रही है, जबकि शासन द्वारा भूसे के खर्च की भरपाई आधी से भी कम है।”

दूसरे राज्यों पर असर
भूसे के निर्यात पर प्रतिबंध और आनन-फानन में उठाए गए कदम बताते हैं कि भूसा संकट हिंदी पट्टी के कई राज्यों में गहरा चुका है (देखें, राष्ट्रीय समस्या, पेज 31)। निर्यात प्रतिबंधों से भूसे की आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो गई है जिससे दिल्ली, राजस्थान, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे उन राज्यों में भी संकट बढ़ गया जहां भूसे का पर्याप्त उत्पादन नहीं होता। दिल्ली के नजफगढ़ क्षेत्र में गोयला और नंगली डेरी क्षेत्र में अधिकांश पशुपालक हरियाणा और पंजाब से आने वाले भूसे पर निर्भर हैं। लेकिन पिछले कुछ महीने से आवक में 20-25 प्रतिशत की कमी हुई है, नतीजतन भूसे का थोक भाव 1,200-1,250 रुपए प्रति क्विंटल का भाव छू रहा है। दिल्ली की तरह राजस्थान भी भूसे की आपूर्ति के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर है।

यहां के लोग चारे के अकाल को बहुत भयावह मानते हैं क्योंकि उनकी रोजी-रोटी का बहुत बड़ा हिस्सा पशुपालन पर निर्भर है। इस साल “चारे के अकाल” से पश्चिमी राजस्थान के सर्वाधिक पशुधन वाले दस जिले ज्यादा प्रभावित हैं। इन जिलों में बीकानेर, बाड़मेर, जोधपुर, जैसलमेर, चुरू, नागौर, हनुमानगढ़, सीकर, झुंझुनू और जालोर शामिल हैं। सीकर के पशुपालक राकेश बिरडा बताते हैं कि चारा 1,200 से लेकर 1,500 रुपए क्विंटल तक हो गया है। अब तो ऐसी स्थिति हो गई है कि वे आपस में एक-दूसरे से चारा उधार लेकर भी काम नहीं चला सकते। पशुपालक कम दूध देने वाले पशुओं और खाद के लिए पालने वाले पशुओं को आवारा पशुओं के रूप में छोड़ देने को विवश हैं। राजस्थान में कुछ घुमंतू समुदाय गांव से अन्य पशुपालकों के पशुओं को 500 रुपए प्रति पशु प्रति माह के हिसाब से पंजाब के इलाकों में चराने के लिए ले जाते थे। इस बार वे 1,000 रुपए प्रति पशु भी ले जाने को तैयार नहीं है।

इस वक्त ज्यादातर पशुपालकों को एक साथ तीन चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है। पहला, खाद्य महंगाई ने उन पर बोझ बढ़ा दिया है, दूसरा लू व बेमौसम बारिश जैसी घटनाओं ने फसलों को नुकसान पहुंचाकर उनकी आय प्रभावित की है और तीसरा, चारे की महंगाई ने पशुधन से अतिरिक्त आय की संभावनाएं धूमिल कर दी हैं।

Tuesday, 10 September 2019

India lost 31% of grasslands in a decade

While area under grazing and common lands saw a decline between 2005 and 2015, croplands increased, according to a report India presented to UNCCD

By Kiran Pandey

Published: Tuesday 10 September 2019


India lost 31 per cent, or 5.65 million hectares (mha), of grassland area in a decade, showed data the Union government presented to the United Nations Convention to Combat Desertification (UNCCD) during the ongoing 14th Conference of Parties (COP).

The total area under grasslands reduced to 12.3 mha from 18 mha between 2005 and 2015.

Grasslands in the Aravalli range in Rajasthan underwent severe degradation, read the report. Other states where land has been severely destroyed include Maharashtra, Karnataka, Gujarat and Uttar Pradesh, it added.

Loss of grazing land can be attributed to two kinds of drivers — direct and indirect. Overgrazing, poor management and deforestation are the direct drivers and conversion of pastures into croplands through encroachment, diversion and allotment driven by increasing population pressure are the indirect drivers.

The country also lost around 19 per cent of its common lands during the same period, according to the report. The area under common lands decreased to 73.02 mha from around 90.5 mha between 2005 and 2015, it added.

Common lands include the grazing grounds, some forest land, ponds, rivers, and other areas that all members of a rural community can access and use. They provide food, water, fodder, firewood and livelihood to rural communities, while also helping recharge groundwater and maintain the land's ecological balance.

Around 4.74 mha of grazing land was diverted as agricultural land across the country. A lot of common land also met the same fate — 29.11 mha of common land was diverted for croplands in the decade, added the report.

Industrialisation and conversion of common lands for non-agricultural purposes became a major cause for the decreasing size of common lands.

During the same period, area under cropland saw nearly an 18 per cent increase to 134.5 mha from 113.6 mha.

But even as these lands are being lost to agriculture to feed the growing population, it is worrying to note that their productivity has also declined. Productivity of at least 26 mha of land has decreased and of this, close to 0.8 mha was grazing land and 5.9 mha common lands.

Declining productivity of grasslands also means poor quality of fodder for livestock.

https://www.downtoearth.org.in/news/agriculture/india-lost-31-of-grasslands-in-a-decade-66643